
जबलपुर। चिकित्सा क्षेत्र की सबसे प्रतिष्ठित संस्था एम्स के नाम पर शहर में बड़ा खेल सामने आया है। आरोप है कि एक सरकारी डॉक्टर ने निजी अस्पताल का संचालन करते हुए मरीजों और उनके परिजनों को गुमराह करने का जाल बिछा रखा है। मामला धनवंतरी नगर स्थित एक अस्पताल से जुड़ा है, जिसका नाम एम्स से मिलता-जुलता बताया जा रहा है।
एम्स के नाम से भरोसे का खेल
जानकारी के मुताबिक, संबंधित डॉक्टर नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में अपनी सरकारी सेवाएं दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निजी अस्पताल का संचालन भी कर रहे हैं। आरोप है कि एम्स जैसे नाम का इस्तेमाल कर मरीजों को यह भ्रम दिया जा रहा है कि यह अस्पताल देश की शीर्ष सरकारी संस्था से जुड़ा हुआ है। इसी भ्रम में आकर कई मरीज यहां भर्ती हो रहे हैं और उनसे भारी शुल्क वसूला जा रहा है।
स्पेलिंग का खेल या नियमों से बचने की कोशिश?
अस्पताल प्रबंधन की ओर से सफाई दी जा रही है कि नाम में अंग्रेजी स्पेलिंग का अंतर है, इसलिए यह नियमों का उल्लंघन नहीं करता। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नाम की समानता ही भ्रम पैदा करने के लिए काफी है और यही इस पूरे मामले का मूल बिंदु है।
क्या कहता है कानून?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सरकारी संस्था के नाम या उससे मिलते-जुलते नाम का उपयोग निजी संस्थानों द्वारा करना प्रतिबंधित है। प्रतीक और नाम अधिनियम, 1950 के तहत कोई भी व्यक्ति या संस्था ऐसे नाम, प्रतीक या लोगो का उपयोग नहीं कर सकती जो सरकार या किसी सरकारी विभाग की पहचान से मेल खाता हो। इसका उद्देश्य आम जनता को धोखे और भ्रम से बचाना है।
एमसीए के नियम भी सख्त
इसके अलावा, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) के नियम भी स्पष्ट करते हैं कि कंपनी या एलएलपी के पंजीकरण के दौरान ऐसे नामों को मंजूरी नहीं दी जाती, जिनसे सरकारी संबंध या समर्थन का आभास होता हो। राष्ट्रीय, केंद्रीय, संघ, मंत्रालय जैसे शब्दों का उपयोग भी इसी कारण प्रतिबंधित है।
जांच की मांग तेज, कार्रवाई पर नजर
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग में शिकायत के बाद जांच की मांग तेज हो गई है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है। लेकिन एक बात साफ है, अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न सिर्फ कानून का उल्लंघन होगा बल्कि चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जनता के भरोसे के साथ बड़ा खिलवाड़ भी माना जाएगा।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved