
नई दिल्ली । भारत (India) ईरान (Iran) में स्थित रणनीतिक रूप से अहम चाबहार बंदरगाह परियोजना (Chabahar Port Project) में अपनी भागीदारी को लेकर धीरे-धीरे पुनर्विचार कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका (America) के प्रतिबंधों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता है, जिसने इस दीर्घकालिक परियोजना के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल (Randhir Jaiswal) ने शुक्रवार को कहा कि भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है।
ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा लगाए गए नये टैरिफ के मद्देनजर इस समझौते से भारत के हटने की अटकलों के बीच एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने यह टिप्पणी की। यसवाल ने कहा- जैसा कि आप जानते हैं, 28 अक्टूबर को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी कर 26 अप्रैल, 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंध छूट के संबंध में दिशा-निर्देश दिए थे। हम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ बातचीत कर रहे हैं।
OFAC की सख्त निगरानी
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की प्रमुख प्रतिबंध प्रवर्तन इकाई विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) भारत की चाबहार में भूमिका पर करीबी नजर बनाए हुए है। चाबहार को लेकर OFAC की निगरानी व्यापक अमेरिकी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत तेहरान पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से ईरान की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को निशाना बनाता रहा है और चाबहार भी इसी दबाव से अछूता नहीं रहा।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर, ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित चाबहार बंदरगाह को नई दिल्ली वर्षों से अपनी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति का अहम स्तंभ मानती रही है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराता है, जिससे पाकिस्तान को बाईपास किया जा सके और पारंपरिक मार्गों पर निर्भरता कम हो। भारत ने इस परियोजना में पर्याप्त निवेश किया है, जिसमें प्रमुख टर्मिनलों का विकास और संचालन भी शामिल है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से परियोजना के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं।
मामले के जानकार सूत्रों के अनुसार, भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना में अपनी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी समाप्त करने के उद्देश्य से लगभग 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर हस्तांतरित करने की प्रक्रिया में है। उन्होंने बताया कि चाबहार बंदरगाह के विकास को आगे बढ़ाने के लिए एक नई संस्था बनाने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, इस विकल्प से परियोजना में भारतीय सरकार की हिस्सेदारी खत्म हो जाएगी, लेकिन एक तरह से इससे नई दिल्ली का समर्थन जारी रहेगा। पिछले साल सितंबर में ट्रंप प्रशासन ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के संबंध में 2018 में दी गई प्रतिबंध छूट को रद्द करने का फैसला सुनाया था।
‘सोची-समझी’ वापसी, अचानक नहीं
सरकारी सूत्रों के अनुसार, दिल्ली इस चरण को अचानक बाहर निकलने के बजाय ‘प्रबंधित और सीमित भागीदारी’ के रूप में पेश कर रही है। उद्देश्य यह है कि अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखते हुए अपने क्षेत्रीय हितों को पूरी तरह नजरअंदाज भी न किया जाए।
जैसे-जैसे अप्रैल 2026 की छूट अवधि नजदीक आ रही है, निगाहें इस बात पर टिकेंगी कि उसके बाद चाबहार को लेकर भारत की रणनीति क्या होगी। क्या भारत न्यूनतम तकनीकी और परिचालन भूमिका में बना रहेगा, या फिर परियोजना से और दूरी बनाएगा- यह आने वाले महीनों में साफ होगा।
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