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काशी के पिशाचमोचन में अकाल मृत्यु के तर्पण की अनोखी परंपरा, घोड़े का कान, गाय की पूंछ और भैंस का सींग छूते हैं श्रद्धालु

October 06, 2026

नई दिल्ली । पितृपक्ष (Pitru Paksha) के दौरान काशी (Kashi) के पिशाचमोचन (Pishach Mochan) में हर दिन बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों और अकाल मृत्यु का तर्पण कराने पहुंच रहे हैं। आदि गंगा विमलोदत्त कुंड (Vimalodatt Kund) के किनारे स्थित इस स्थान पर रोजाना 20 हजार से अधिक लोगों के आने की बात बताई गई है। यहां करीब 10 से 12 तरह के श्राद्ध कर्म (Shraddha Rituals) कराए जाते हैं। नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध (Tripindi Shraddha) और तर्पण के बाद कुछ विशेष परंपराओं को इस प्रक्रिया का अंतिम हिस्सा माना जाता है।

पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म के बाद संजाब नस्ल के शक्ति घोड़े का कान छूने की परंपरा है। इसके साथ ही अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति की तस्वीर का फ्रेम पीपल के सूखे पेड़ पर लगाने की प्रक्रिया भी होती है। मान्यता से जुड़ी इस परंपरा में अकाल मृत्यु वाले पितरों की शांति की कामना की जाती है। पितृपक्ष शुरू होने से एक दिन पहले से संजाब नस्ल के दो घोड़े यहां मौजूद हैं। इन घोड़ों का उपयोग साल में श्राद्ध के 15 दिनों के दौरान होता है, जबकि बाकी समय विवाह के लिए उनकी बुकिंग की जाती है।

पिशाचमोचन क्षेत्र में करीब 10 से 15 पीपल के पेड़ बताए गए हैं, जिन पर लगभग 500 तस्वीरें लगी हुई हैं। यहां मौजूद पंडित अमित मिश्रा के अनुसार, इन तस्वीरों को ऐसी आत्माओं से जोड़ा जाता है जिनकी मृत्यु अचानक हुई और जिन्हें शांतिपूर्वक विदाई नहीं मिली। इसी क्रम में गाजीपुर के एक व्यक्ति की पत्नी और बेटी भी करीब 30 साल पहले हुई मृत्यु के बाद श्राद्ध कराने यहां पहुंची थीं। उन्होंने बताया था कि मृतक का नाम मुख्तार था और वह सपने में आते थे, जिससे उन्हें डर लगता था।

पिशाचमोचन में श्राद्ध कर्म कराने वालों में आर्थिक रूप से अलग-अलग वर्गों के लोग शामिल होते हैं। यहां सभी एक साथ बैठकर पिंडदान करते दिखाई देते हैं। इनमें नेता, जज, फिल्म स्टार और संपन्न परिवारों के लोग भी शामिल बताए गए हैं। एक मृतक के तर्पण के लिए 15 से 20 हजार रुपये तक खर्च होता है और कई बार यह राशि 30 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। भीड़ अधिक होने के कारण कुंड के आसपास के अलावा पास के पांच-छह भवनों में भी श्राद्ध कर्म कराया जाता है।

अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए पीपल के पेड़ पर मृतक की तस्वीर का फ्रेम लगाने की परंपरा भी इसी प्रक्रिया में शामिल है। इसके अलावा घोड़े का कान, भैंस का सींग और गाय की पूंछ छूकर पितरों के नाम पर नियमित दान करने की परंपरा बताई गई है। जिस संजाब नस्ल के घोड़े का कान छुआ जाता है, उसका नाम शक्ति है। एक व्यक्ति घोड़े का कान छूने के लिए कम से कम 10 रुपये देता है और बताया गया है कि यह घोड़ा हर दिन कम से कम 50 हजार रुपये कमाता है।

पिशाचमोचन में अकाल मृत्यु के लिए नारायण बलि सबसे महंगा श्राद्ध बताया गया है। पांच ब्राह्मणों से नारायण बलि कराने की राशि 15 हजार रुपये है, जबकि त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए आठ हजार और पार्वण श्राद्ध के लिए 2500 रुपये खर्च होते हैं। गयातीर्थ और गया श्राद्ध की राशि निश्चित नहीं है और यह 1100 से 2500 रुपये या उससे अधिक हो सकती है। परिवार में एक साथ कई लोगों की अकाल मृत्यु होने पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग श्राद्ध कराया जाता है।


  • यहां मुन्ना पंडा के परिवार के लोग प्रमुख महंत होते हैं, जबकि पितृपक्ष के 15 दिनों में करीब 400 पंडे श्राद्ध कर्म कराने के लिए काम करते हैं। तर्पण के लिए बैठने की जगह का 500 रुपये किराया लिया जाता है। एक तर्पण में करीब डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। काम सूर्योदय के साथ शुरू होकर आधी रात तक चलता है। व्यवस्था के लिए पंडे वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल करते हैं और इसी माध्यम से पानी, गोबर, दूध तथा सफाई से जुड़ी जरूरतों के लिए सूचना दी जाती है। यहां आने वाले यजमान को मुख्य रूप से दक्षिणा लेकर आना होता है, जबकि श्राद्ध कर्म से जुड़ी सामग्री पैकेज के तहत वहीं उपलब्ध कराई जाती है।

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