
नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता(a veteran leader of the Samajwadi Party) और रामपुर जेल(Rampur Jail) में बंद आजम खान(Azam Khan) ने इस साल ईद को लेकर एक बड़ा और भावुक संदेश जारी(significant and emotional message regarding Eid this year) किया है। शनिवार को सपा नेता यूसुफ मलिक और अन्य नेताओं ने जेल में आजम खान और उनके बेटे(Azam Khan and his son) अब्दुल्ला आजम(Abdullah Azam) से मुलाकात की। मुलाकात के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए बताया गया कि आजम खान ने मुस्लिम समुदाय(Muslim community), विशेषकर सुन्नी मुसलमानों (specifically Sunni Muslims)से अपील की है कि वे इस बार ईद(Eid) की नमाज के दौरान काले कपड़े पहनें या बांह पर काली पट्टी(black attire or don black armbands) बांधकर विरोध का प्रतीकात्मक प्रदर्शन करें(symbolic gesture of protest)।
इस अपील के पीछे की वजह ईरान में हाल ही में हुई दुखद घटना है, जिसमें 160 बच्चियां शहीद हुईं। आजम खान ने कहा कि यह इंसानी और नैतिक जिम्मेदारी है कि इस हादसे पर शोक व्यक्त किया जाए और दुनिया का ध्यान इस घातक घटना की ओर खींचा जाए। उनके अनुसार, ये बच्चियां भी हमारी अपनी बेटियों जैसी थीं और उनके लिए सम्मान जताना हम सभी का कर्तव्य है।
आजम खान ने अपनी अपील में कहा कि इस साल ईद पर लोग सिर्फ काले कपड़े पहनें और काली पट्टी बांधें, बल्कि सामान्य हंसी-खुशी और पारंपरिक उत्सव से दूर रहें। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईद के दिन सादगी बनाए रखना और ‘खिराज-ए-तहसीन’ के रूप में इन मासूमों को श्रद्धांजलि देना चाहिए। उनका यह संदेश वैश्विक स्तर पर मासूमों के प्रति हो रहे जुल्म के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध के रूप में देखा जा रहा है।
मुलाकात में आजम खान की पत्नी तजीन फात्मा भी मौजूद थीं। लगभग आधे घंटे तक चली इस मुलाकात में राजनीतिक चर्चाओं के बजाय मानवीय और सामाजिक संवेदनाओं पर बातचीत हुई। जेल प्रशासन की कड़ी सुरक्षा के बीच यह बातचीत पूरी हुई। सपा नेता यूसुफ मलिक ने मीडिया को बताया कि आजम खान लगातार मानवता और इंसानी मूल्यों पर जोर देते रहे हैं, और उनके संदेश का असर न केवल रामपुर बल्कि आसपास के जिलों में भी देखा जा रहा है।
ज्ञात हो कि आजम खान लंबे समय से जेल में बंद हैं, लेकिन उनके पैगाम और बयानों का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव लगातार महसूस किया जा रहा है। इस अपील के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईद के दिन उनके संदेश का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है और मुस्लिम समुदाय किस हद तक इस प्रतीकात्मक विरोध में शामिल होता है।
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