
रेमण्ड (Raymond) जैसी विश्वविख्यात कम्पनी (World-renowned company) के करोड़ के मालिक की एक किराए (Rents) के कमरे में हुई दु:खद मौत ने साबित कर दिया कि सीख तो भीख में नहीं मिलती… वो तो ठोकर खाकर ही इंसान पाता है… अपना सब कुछ लुटाकर जब कंगाल बन जाता है तो जमाने के लिए सीख बन जाता है… लेकिन उसकी हालत देखकर भी जमाना कुछ सीख नहीं पाता है… सीख तो वो होती है जो राजा रंक बनकर पाता है… अमीर फटेहाल होकर कमाता है… कमाया हुआ लुटाकर जब इंसान बेहाल हो जाता है तो समझ में आता है सीख कितनी महंगी होती है… क्योंकि सस्ती सीख किसी को नहीं सुहाती है… दूसरों पर बीती किसी का ज्ञान नहीं बढ़ाती है… जब अपने पर आती है तो दूसरों का दर्द समझ में आता है… जमाना लाख कहता है भरोसा अपने बच्चों पर भी मत करो… इसलिए नहीं कि बच्चे बेईमान होते हैं, बल्कि इसलिए कि भरोसा उन्हें बेईमान बना देता है… भरोसे से हासिल दौलत उसे मेहनत से नहीं, बल्कि रहमत से मिलती है… जिसमें न पसीने की सुगंध होती है और न अनुभव की ठोकरें…न गिरने का डर होता है, न बुलंदगी की मशक्कत…सालों की मेहनत दौलत-शोहरत को हासिल करने के लिए एक बेटे को केवल अपने पिता को धोखा ही तो देना होता है… यही किया गौतम सिंघानिया ने… 35 मंजिला घर से निकालकर अपने पिता विजयपत सिंघानिया को एक किराए के घर में धकेलने वाले बेटे ने न केवल उनकी सारी कम्पनियों पर कब्जा कर लिया, बल्कि उन्हें अपने जीवन के अंतिम दिन शांति से गुजारने के लिए एक आशियाना भी नहीं छोड़ा… विजयपत ने अपनी अमीरी के चलते कई गरीबों की मदद की, लेकिन उनकी गरीबी में उनका साथ देने कोई नहीं आया… वो रोते रहे, सुबुकते रहे, दुनिया को अपना दर्द सुनाते रहे, लेकिन वो दर्द कहानी बनकर अखबारों से लेकर सोशल मीडिया में चटखारे बनकर बहता रहा… विजयपत भी मानते रहे कि पुत्र मोह में उन्होंने अपने जीवन की सारी कमाई कम्पनी के शेयर, घर, मकान बेटे के नाम कर दिए… किसी और माता-पिता को यह भूल नहीं करना चाहिए, वरना दौलत तो जाती है… पुत्र भी चला जाता है और केवल पुत्र ही नहीं जाता, परिवार भी कलंकित हो जाता है… यह कोई नई कहानी नहीं है… यह विजयपत की ही जुबानी नहीं है… ऐसे हजारों किस्से दर्द में दफन हैं, लेकिन जैसे पहले कहा कि सीख भीख में नहीं मिलती, वो ठोकरों में सिला बनती है… हर पुत्र बेवफा नहीं होता, लेकिन बेवफाई तो बेटों को ढूंढती रहती है… इसलिए खुद भी बचें और बच्चों को भी बचाएं… न खुद विजयपत बनें न बच्चों को गौतम बनने दें…
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