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मौत का ‘फोबिया’ कुत्ते के काटने के बाद रेबीज के खौफ ने ली जान, बैंक कर्मचारी ने डर में आकर दी जान

February 24, 2026

नई दिल्ली। कभी-कभी एक छोटा(Sometimes a small fear) सा डर इंसान के दिमाग पर इस कदर हावी हो जाता है कि वह मौत को ही अपना आखिरी रास्ता मान लेता है। महाराष्ट्र के कल्याण(Kalyan, Maharashtra) से एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली खबर(heartbreaking news) सामने आई है, जहाँ 30 साल के एक शिक्षित बैंक कर्मचारी(30-year-old educated bank employee) ने केवल इस डर से आत्महत्या(committed suicide) कर ली कि कहीं उसे रेबीज न हो जाए। यह मामला न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि ‘हेल्थ एंग्जायटी(‘health anxiety)’ और ‘लाइसोफोबिया'(lysophobia’) (रेबीज होने का डर) का एक भयावह उदाहरण(fear of getting rabies) भी है।

घटना की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई, जब कल्याण पूर्व के तिसगांव नाका निवासी विश्वनाथ अमीन को एक आवारा कुत्ते ने काट लिया। विश्वनाथ कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं थे; वह पिछले 8 सालों से ठाणे स्थित भारत बैंक में एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत थे। कुत्ते के काटने के तुरंत बाद उन्होंने पूरी सावधानी बरती और समय पर एंटी-रेबीज इंजेक्शन का कोर्स भी शुरू कर दिया। लेकिन असली जंग उनके शरीर में नहीं, बल्कि उनके दिमाग में शुरू हो चुकी थी।

परिवार और पुलिस के अनुसार, इंजेक्शन लगवाने के बावजूद विश्वनाथ के मन में यह वहम घर कर गया कि वायरस उनके शरीर में प्रवेश कर चुका है। उन्हें अपने शरीर में होने वाले सामान्य बदलाव भी ‘रेबीज के लक्षण’ लगने लगे। वे लगातार घबराहट और चिंता (Anxiety) के दौर से गुजरने लगे। उन्हें लगने लगा कि वे एक ऐसी लाइलाज और दर्दनाक बीमारी की ओर बढ़ रहे हैं, जिसका अंत बेहद वीभत्स होता है। इसी ‘डेथ एंग्जायटी’ ने उन्हें इस कदर तोड़ा कि उन्होंने जिंदगी की जंग हारने का फैसला कर लिया।

पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है, जो उनके भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व की गवाही देता है। सुसाइड नोट में विश्वनाथ ने साफ तौर पर लिखा कि वह रेबीज के डर और उसके संभावित लक्षणों की पीड़ा के खौफ की वजह से यह कदम उठा रहे हैं। उनके परिवार ने भी पुष्टि की है कि कुत्ता काटने की घटना के बाद से वे पूरी तरह बदल गए थे और हर वक्त इसी बीमारी के खौफ में रहते थे।


  • फिलहाल, कल्याण पुलिस ने आकस्मिक मृत्यु (ADR) का मामला दर्ज किया है। पुलिस अधिकारी अब इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि क्या वाकई यह केवल बीमारी का डर था या इसके पीछे कोई और छिपी हुई वजह भी थी। फॉरेंसिक और मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है ताकि आत्महत्या की असली वजह साफ हो सके।

    यह घटना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। चिकित्सा विशेषज्ञ बार-बार कहते हैं कि रेबीज का टीका 99% से अधिक प्रभावी है, लेकिन ‘इंटरनेट’ पर अधूरी जानकारी पढ़ना और बिना डॉक्टरी सलाह के लक्षणों को खुद ही डायग्नोस करना (Self-Diagnosis) किसी को भी मानसिक रूप से बीमार कर सकता है। विश्वनाथ की मौत हमें याद दिलाती है कि शरीर के इलाज के साथ-साथ मन का इलाज और सही संवाद भी उतना ही जरूरी है।

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