
मुंबई। मराठवाड़ा (Marathwada) में इस बार मानसून (Monsoon) की बेरुखी ने किसानों (Farmers) की खरीफ फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है। लातूर, बीड और धाराशिव समेत आसपास के इलाकों में सोयाबीन (Soybean) पीली पड़ गई है, कपास की बढ़वार रुक गई और अरहर मुरझाने लगी है। गन्ना भी सामान्य ऊंचाई हासिल करने से पहले सूख रहा है। क्षेत्र में करीब 80% फसलें बर्बाद होने का अनुमान है और जलस्रोतों में पानी तेजी से घट रहा है।
आसमान से देखने पर खेतों में हरियाली नजर आती है, लेकिन जमीन पर हालात अलग हैं। कई खेतों में खड़ी फसल अब पैदावार देने की स्थिति में नहीं बची है। इसका असर सिर्फ इस सीजन की खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के सामने अगली फसल के लिए बीज, खाद और अन्य खर्च जुटाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
लातूर-बीड में सामान्य से काफी कम बारिश
लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव को सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में बताया जा रहा है। जून से सितंबर के बीच इन क्षेत्रों में सामान्य बारिश 679.5 मिलीमीटर होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार केवल 424.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई।
बारिश की कमी ने खेती के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। खेतों में चारे की कमी बढ़ रही है। ग्रामीण मजदूरी और घरेलू आमदनी पर असर पड़ रहा है। साथ ही किसान अगली फसल की तैयारी के लिए जरूरी पूंजी जुटाने की स्थिति में नहीं हैं।
देवकरा में किसान ने की आत्महत्या
लातूर जिले के देवकरा गांव से सूखे के बीच एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां पहली बार एक किसान ने आत्महत्या की है। दो एकड़ जमीन पर खेती करने वाले तुकाराम गुट्टे ने यह कदम उठाया।
कीनगांव से आगे बढ़ने पर खेतों की स्थिति सूखे की गंभीरता दिखाती है। सोयाबीन, कपास और अरहर की फसलें खेतों में सूखती नजर आती हैं। हिंगणगांव के किसान तुकाराम अंबाजी के पास 40 एकड़ जमीन है। वे बताते हैं कि खेती पर प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन अब उन्हें आशंका है कि इस बार लागत भी वापस नहीं निकल पाएगी।
डेढ़ लाख खर्च के बाद फसल हटाने का भी खर्च
हगदल गांव में किसान बालाजी मुंडे गन्ने के खेत की स्थिति बताते हैं। उनके मुताबिक सामान्य परिस्थितियों में गन्ना 20 से 25 फुट तक ऊंचा हो जाता है, लेकिन इस साल 10 से 12 फुट की ऊंचाई पर ही उसकी बढ़वार रुक गई। अब गन्ना सूखने लगा है।
मुंडे के मुताबिक 2025 में जरूरत से ज्यादा बारिश ने परेशानी बढ़ाई थी और इस साल बारिश की कमी ने संकट खड़ा कर दिया है। सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार की खेती करते हैं। उन्होंने 8 एकड़ में फसल उगाने पर करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च किए हैं।
अब खेत से खराब फसल हटाने के लिए भी प्रति एकड़ करीब 5 हजार रुपए खर्च करने होंगे। उनका कहना है कि फसल में कुछ बचता है तो वह केवल मवेशियों के चारे के रूप में इस्तेमाल हो सकेगा।
नदी सूखी, जलाशयों में 12.5% स्टोरेज
सूखे का असर खेतों के साथ जलस्रोतों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। लातूर और बीड जिलों के तालाबों में पानी बेहद कम बचा है। लातूर की जीवनवाहिनी मानी जाने वाली माजरा नदी भी सूखी स्थिति में है।
लातूर शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध में भी जलस्तर काफी नीचे पहुंच गया है। लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत पानी का भंडारण अब करीब 12.5 प्रतिशत रह गया है।
पुराना साइ डैम भी अब नहीं आ रहा काम
लातूर का नवाबकालीन साइ डैम भी क्षेत्र के पुराने जल इतिहास का हिस्सा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल बताते हैं कि कभी इसी डैम के पानी से लातूर शहर की जरूरतें पूरी होती थीं। फिलहाल यह डैम इस्तेमाल में नहीं है।
पाटिल का कहना है कि जल रिसाव रोकने और पानी के बेहतर प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो मौजूदा संकट की तीव्रता को कुछ कम किया जा सकता था।
पहले बुआई, फिर फसल बचाने और अब फसल हटाने का संकट
मराठवाड़ा के किसानों से बातचीत में वर्ष 1972 का सूखा बार-बार चर्चा में आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं।
उनके मुताबिक इस बार संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही मिलने लगे थे। अब किसानों के सामने संकट तीन स्तर पर पहुंच गया है। पहले बुआई के लिए पानी का संकट था। इसके बाद खड़ी फसल को बचाने की चुनौती आई और अब फसल खराब होने के बाद उसे खेत से हटाने तथा अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की समस्या सामने है।
सरकार के सामने 50 हजार करोड़ के खर्च की चुनौती
महाराष्ट्र सरकार ने सूखे की स्थिति से निपटने के लिए राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में राज्य के 265 तालुकों के बाद 43 और तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल किया गया है। फसल नुकसान के पंचनामे तैयार करने के साथ पानी और चारे की व्यवस्था जैसे उपायों पर भी चर्चा हुई है।
अधिकारियों के मुताबिक सूखे से निपटने के लिए सरकार पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आ सकता है। हालांकि किसानों की जरूरत केवल फसल नुकसान की भरपाई तक सीमित नहीं है। प्रभावित परिवारों को पानी और पशुओं के लिए चारे के इंतजाम के साथ अगली फसल आने तक परिवार का खर्च चलाने के लिए आय के सहारे की भी जरूरत होगी।
मराठवाड़ा में इस समय सबसे बड़ी चिंता यही है कि इस सीजन की बर्बाद फसल के बाद किसान अगली खेती की शुरुआत किस तरह करेंगे। खेत में खड़ी फसल का नुकसान अब सीधे ग्रामीण परिवारों की आमदनी और भविष्य की खेती की क्षमता पर असर डाल रहा है।
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