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भोपाल के अधिकारियों की अनदेखी और मनमानी के चलते, 69 दिन बाद भी रालामंडल के पिंजरे में कैद है तेंदुआ

March 22, 2026

डाक्टर बोले, अब बड़े बाड़े में रखना जरूरी

इन्दौर। वनविहार रेस्क्यू सेंटर (Van Vihar Rescue Center) भोपाल (Bhopal ) के अधिकारियों (officials) की अनदेखी के चलते 69 दिन बाद भी तेंदुआ (leopard) रालामण्डल अभयारण्य (Ralamandal Sanctuary) में पिंजरे में कैद है, जबकि उसका इलाज करने वाले वेटरनरी डाक्टर का कहना है कि तेंदुए को अब एक सुरक्षित बड़े बाड़े में रखने की जरूरत है, जहां पर वह घूम-फिरते हुए चहलकदमी कर सके। यदि तेंदुआ पिंजरे में ज्यादा दिन रहा तो उसके न सिर्फ विकलांग होने का खतरा है, बल्कि उसे जंगल में छोडऩा भी नामुमकिन होगा।


  • लगभग 700 वर्ग किलोमीटर वाले इंदौर वनमण्डल में रेस्क्यू सेंटर नहीं होने की कीमत आसपास या बाहर से रेस्क्यू कर लाए वन्यजीवों को चुकाना पड़ रही है। रेस्क्यू कर लाए घायल वन्यजीवों के इलाज के लिए इंदौर वन विभाग को कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय बनाम चिडिय़ाघर वालों के रहमोकरम पर या शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर महू वेटरनरी हास्पिटल पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी तरह के हालात और बेबसी से 11 जनवरी को उमरियाखुर्द के कुएं से निकाले गए तेंदुए को 69 दिन से जूझना पड़ रहा है। कुएं से रेस्क्यू कर तेंदुए को लाने के बाद इलाज के लिए महू वेटरनरी हास्पिटल ले जाया गया, जहां एमआरआई एक्सरे की रिपोर्ट में उसके पिछले हिस्से और रीढ़ में अंदरूनी चोट के चलते मस्क्यूलर डैमेज बताया गया। डाक्टर ने यह भी कहा कि अगर इसका लगातार उचित इलाज नहीं किया गया तो इसका पिछला हिस्सा हमेशा के लिए बेकार हो सकता है। इसलिए इसे हर तीसरे दिन लेजर फिजियोथैरेपी सहित इलाज की जरूरत है। इसके बाद जनवरी माह तक तेंदुए का
    इलाज चला।

    विकलांग न हो इसलिए उसे टहलने, घूमने-फिरने के लिए खुले में रखना जरूरी
    इसके बाद महू के डाक्टर ने कहा इलाज के दौरान तेंदुए की स्थिति में बहुत सुधार है, मगर अब पिंजरे से निकालकर इसे इतने बड़े बाड़े में रखने की जरूरत है, जहां यह आजादी से घूम-फिर और टहल सके। वरना इलाज के बावजूद भी यह विकलांग हो सकता है। इंदौर वन विभाग की मजबूरी यह है कि ऐसे बाड़े की सुविधा उनके पास नहीं है। इस कारण इन्दौर वन विभाग तेंदुए को भोपाल वन विहार में रखने के लिए रेस्क्यू सेन्टर वन विहार के अधिकारियो को कई बार लिख चुका है, मगर इसके बावजूद भोपाल वन विहार के अधिकारी उनके रेस्क्यू सेन्टर में जगह नहीं है, यह कहकर मना करते आ रहे हंै। भोपाल वन विभाग की यह मनमानी वन्यजीव संरक्षण सम्बन्धित नीति सहित कथनी और करनी में अंतर का खुलासा करती है।

    इसके अलावा भी एक मादा तेंदुआ और शावक भी भोपाल के अधिकारियों की मनमानी के शिकार
    भोपाल वन विहार की मनमानी का शिकार सिर्फ यही तेंदुआ नहीं है। इसके अलावा और भी मामले हैं। पिछले साल 2025 में महू फॉरेस्ट रेंज के हरसोला गांव से एक मादा तेंदुआ और कुछ दिनों बाद 2 शावक तेन्दुओं को इंदौर लाया गया था। शिकारी द्वारा लगाए गए क्लिच वायर के फंदे में पैर फंसने से घायल तेंदुए को रखकर प्रारंभिक इलाज किया गया। उसके घायल पैर की स्थिति गम्भीर होने पर चिडिय़ाघर वालों ने उसे वन विहार ले जाने की सलाह दी, मगर हर बार की तरह इस मामले में भी वन विहार ने टालमटोल का रवैया अपनाया। आखिरकार इस मादा तेंदुए का पंजा काटना पड़ा। इसी दौरान एक शावक तेंदुए की मौत भी हो गई, मगर इसके बावजूद भोपाल वन विहार के अधिकारियों की मनमानी जारी रही। पिछले साल से मादा तेंदुआ और एक शावक इंदौर चिडिय़ाघर में ही हैं।

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