
नई दिल्ली। अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच बढ़ते संघर्ष ने मध्य-पूर्व में युद्ध के हालात पैदा कर दिए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हालात चाहे तनावपूर्ण हों, लेकिन ईरान के पास अमेरिका और इजरायल (Israel) जैसी ताकतों का लंबे समय तक मुकाबला करने की क्षमता नहीं है।
अमेरिका के तीन मुख्य लक्ष्य
सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह के अनुसार अमेरिका के ईरान पर हमलों के पीछे तीन उद्देश्य हैं—पहला, ईरान में सत्ता परिवर्तन; दूसरा, उसके मिसाइल कार्यक्रम को ध्वस्त करना; और तीसरा, परमाणु कार्यक्रम पर आगे न बढ़ने देना। उनका मानना है कि अमेरिका चाहता है कि ईरान इतना कमजोर हो जाए कि भविष्य में उससे कोई खतरा न उत्पन्न हो।
वहीं, ईरान की तरफ से हमले जवाबी हैं। लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि उसके पास लंबे संघर्ष के लिए संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है, और एयरफोर्स भी उतनी ताकतवर नहीं। रूस और चीन मदद देने की स्थिति में दिखते हैं, लेकिन रूस इस समय हथियार उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है। चीन की सहायता भी अमेरिका-इजरायल से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
संघर्ष के सीमित विकल्प
पूर्व एयर वाइस मार्शल ओपी तिवारी का कहना है कि ईरान लंबे समय तक युद्ध जारी नहीं रख सकता। हिजबुल्ला और कुछ शिया संगठन समर्थन में तो हैं, लेकिन पहले की तरह ताकतवर नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध में ईरान की स्थिति संकटपूर्ण है और उसकी भारी तबाही तय है।
तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कारण पहले ही तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। मध्य-पूर्व से भारत भी तेल खरीदता है, इसलिए आपूर्ति बाधित हो सकती है। हालांकि अमेरिका को इसके लाभ भी मिल सकते हैं, क्योंकि उसके पास वेनेजुएला का अतिरिक्त तेल उपलब्ध है। भारत रूस से तेल खरीदने का विकल्प जारी रख सकता है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा चुनौती
लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह के अनुसार ईरान, इजरायल, कतर, सऊदी अरब, बहरीन और यूएई में लाखों भारतीय नागरिक रहते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होगा। भले ही ईरान के हमले अमेरिकी बेसों पर केंद्रित हों, मिसाइलें रास्ता भटक सकती हैं और नागरिकों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
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