
भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) ने आदर्श मानवता (Humanity) का संदेश देते हुए सत्ता और सहिष्णुता (Tolerance) में से सहिष्णुता को चुना… और वनवास (vanavaas) पर चले गए… वो चाहते तो पिता राजा दशरथ की अवज्ञा कर सकते थे… मंथरा की कुटिलता का जवाब बन सकते थे… माता कैकेयी को ममत्व का पाठ पढ़ा सकते थे, लेकिन उन्होंने संन्यास का मार्ग चुना…उस संन्यास का, जहां कष्ट था, पीड़ा थी, दर्द था, कांटे थे, कुटिया थी, उसका यह कदम मानव जीवन के लिए संदेश था तो पिता के प्रति प्रेम और आदर की पराकाष्ठा की अभिव्यक्ति… अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए भगवान श्रीराम जहां थे, वहीं से रावण का वध कर सकते थे, लेकिन उन्हें केवट का उद्धार करना था… शबरी के बेर खाने थे… बाली को भातृत्व सिखाना था और हनुमानजी के भक्तिभाव के दुनिया को दर्शन कराना थे… वो संदेश का मार्ग था जो भगवान राम ने चुना… वो रावण को तब तक नहीं मार सकते थे, जब तक उसमें व्याप्त अहंकार का परिचय दुनिया को कराकर यह संदेश नहीं दे पाते कि भगवान का वरदान भी तब बौना हो जाता है, जब इंसान में अहंकार जाग जाता है…वो रावण का वो परिवार भी दुनिया को दिखाना चाहते थे, जिसमें भाई की आज्ञा पर जान देने वाले कुंभकर्ण जैसे भाई थे तो ज्ञान देने वाले विभीषण… उनके इंद्रजीत, अतिकाय जैसे बेटे थे तो मंदोदरी जैसी तपस्विनी पत्नी…रावण के वध से भगवान राम के ज्ञान का अंत नहीं हो जाता, बल्कि दूसरा अंश तब शुरू होता है, जब एक धोबी के लांछन से माता सीता का त्याग और पवित्रता के लिए माता सीता का अग्नि में प्रवेश यह संदेश देता है कि मानव जीवन में ऐसे कई मौके आते हैं, जब आप भगवान राम की तरह माता सीता जैसी अपनी सर्वोच्च आकांक्षा और प्रेम की विरह-वेदना में घिर जाते हैं और ऐसे कई वक्त आते हैं, जब सत्य को जानने, मानने और सच्चे होने के बावजूद दुनिया को सत्य से परिचित कराने के लिए अग्नि परीक्षा में उतारे जाते हैं… लव-कुश जैसे बच्चे भगवान राम से बिछड़ जाते हैं और हम जैसे लोग अपने बच्चों पर स्वार्थ और मतलबी होने का आरोप लगाते हैं… हम छोटी-छोटी मुसीबतों में घिरकर व्यथित होकर भगवान राम की शरण में जाते हैं…अपने दु:खों से मुक्ति पाना चाहते हैं, जबकि श्रीराम तो पीड़ा को सहन करने और स्वयं से लडऩे और जीतने की प्रेरणा देने वाले महामानव थे, जिन्हें हमने ईश्वर के रूप में तो स्वीकार कर लिया, लेकिन उनके मानव रूप को स्वीकार नहीं कर पाए…हम भगवान राम की भक्ति करना चाहते हैं, लेकिन उनका जीवन नहीं स्वीकारते हैं…हम अपने भाई के लक्ष्मण रूप को नहीं पहचानते हैं…पिता का त्याग, उसकी व्यथा और मजबूरी को नहीं जान पाते हैं… कैकेयी जैसी सांसारिक कुटिलता, कायरता से विचलित हो जाते हैं… हम राम को पूजना जानते हैं…उनके भक्तिभाव में रातें बिताते हैं, लेकिन उनके संदेश और ज्ञान को समझ नहीं पाते हैं और हर साल रामनवमी मनाते हैं… यदि हम राम को समझ पाएं तो हर दिन नवमीं हो जाए….
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