नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा है कि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ सिर्फ इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि उसके आदेश में कोई गलती है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश (MP) के एक जिला न्यायाधीश की बर्खास्तगी (Dismissal of the judge) रद्द कर दी। इस जिला न्यायाधीश ने आबकारी अधिनियम के तहत आरोपियों को जमानत देने में अलग-अलग मापदंड अपनाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक निडर न्यायाधीश एक स्वतंत्र न्यायपालिका की आधारशिला है। ठीक उसी तरह जैसे एक स्वतंत्र न्यायपालिका स्वयं वह नींव है जिस पर कानून का शासन टिका हुआ है।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति
जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यह मामला न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को उजागर करता है। उन्हें 27 साल के बेदाग रिकॉर्ड के बाद केवल उन चार न्यायिक आदेशों के कारण सेवा से हटा दिया गया था, जिनके द्वारा उन्होंने कुछ पक्षों को जमानत पर रिहा कर दिया था। बेंच ने सुलिया की अपील को स्वीकार कर लिया, जिन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की सिफारिश पर राज्य सरकार द्वारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, क्योंकि एक जांच अधिकारी ने जमानत आदेश पारित करने में भ्रष्टाचार के आरोपों में दम पाया था। इसने कहा कि दो सितंबर, 2015 का बर्खास्तगी आदेश, 17 मार्च, 2016 का अपीलीय प्राधिकारी का आदेश और हाई कोर्ट का विवादित आदेश सभी रद्द किए जाते हैं। अपीलकर्ता को सेवानिवृत्ति की सामान्य आयु प्राप्त होने तक सेवा में बने रहने वाला माना जाएगा।
पूरा बकाया वेतन दें
शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि अपीलकर्ता को बिना किसी गलती के सेवा से बाहर रखा गया है, इसलिए हमारी राय है कि अपीलकर्ता को सभी संबंधित लाभों सहित पूरा बकाया वेतन दिया जाना चाहिए। आज से आठ सप्ताह की अवधि के भीतर 6 प्रतिशत की दर से ब्याज सहित मौद्रिक लाभ जारी किए जाएं। इसने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल किसी आदेश के गलत होने या निर्णय में त्रुटि होने के कारण, बिना किसी अन्य कारण के, किसी न्यायिक अधिकारी को अनुशासनात्मक कार्यवाही या अभियोजन की पीड़ा से न गुजरना पड़े। बेंच ने अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ पीड़ित पक्षों के कहने पर तुच्छ आरोप लगाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई और ऐसे अधिकारियों की सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
बताया साहसिक फैसला
अदालत ने कहा कि इसी कारण अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारी जमानत देने से हिचकते हैं और हाई कोर्ट्स एवं सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ जाता है। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि बार के सदस्य भी न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ तुच्छ आरोप लगाने में लिप्त रहते हैं और उसने उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी। फैसला लिखने वाले जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि उच्च न्यायालयों को केवल परस्पर विरोधी न्यायिक आदेशों के कारण न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते समय सावधानी बरतनी चाहिए। जस्टिस पारदीवाला ने निर्णय से सहमति जताते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे फैसले की सराहना की। साथ ही कहा कि यह बहुत साहसिक फैसला है, जो ईमानदार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में काफी मदद करेगा।
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