
जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की एकलपीठ ने सड़क हादसे से जुड़े मामले में अहम निर्णय सुनाते हुए पीडि़त के पक्ष में फैसला दिया है। अदालत ने साफ किया कि बस का परमिट वैध हो अथवा नहीं, यदि वाहन का इंश्योरेंस मौजूद है तो ओरिएण्टल इंश्योरेंस कंपनी अपनी वैधानिक देनदारी से पीछे नहीं हट सकती।
यह पूरा प्रकरण स्वर्गीय रूपनारायण यादव और उनकी पत्नी जानकी बाई के बेटे गुड्डू उर्फ उमेश यादव व उनके दामाद से जुड़ा है। दोनों रिश्तेदार जब एक मोटरसाइकिल पर सवार होकर जा रहे थे, तभी एक यात्री बस ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी थी। इस भीषण सड़क दुर्घटना में गुड्डू उर्फ उमेश यादव की मौके पर जान चली गई, जबकि उनके दामाद गंभीर रूप से चोटिल हो गए। इसके बाद स्थानीय पुलिस प्रशासन ने संबंधित बस चालक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 337 के अंतर्गत मुकदमा कायम कर जांच आगे बढ़ाई थी। सड़क हादसे में बेटे को खोने के बाद पीडि़त माता-पिता ने इंसाफ के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण जबलपुर की शरण ली थी। इस ट्रिब्यूनल के समक्ष आश्रितों की ओर से क्षतिपूर्ति राशि दिलाने की गुहार लगाई गई। पूरे घटनाक्रम और साक्ष्यों का परीक्षण करने के उपरांत दावा अधिकरण ने मृतक के परिजनों के पक्ष में फैसला सुनाया था। न्यायालय ने 2,90,000 रुपये का दावा मंजूर करते हुए उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज जोडऩे का निर्देश जारी किया था। दायित्व को चुकाने की जिम्मेदारी संबंधित बीमा संस्था पर डाली गई थी।
परमिट के अभाव में दी चुनौती
दावा अधिकरण के इस आदेश के खिलाफ बीमा फर्म ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी। कंपनी की ओर से मुख्य दलील यह रखी गई कि दुर्घटना के समय बस संचालक के पास वैध मार्ग परमिट मौजूद नहीं था। संस्था का कहना था कि बिना उचित अनुमति पत्र के वाहन का संचालन नियमों का उल्लंघन है, इसलिए किसी भी प्रकार के हर्जाने का भुगतान करना उनके कानूनी दायरे में नहीं आता। कमी को आधार बनाकर कंपनी ने राहत राशि रोकने की मांग रखी थी।
अनुबंध का मिला लाभ
अदालत में आश्रित माता-पिता का पक्ष रखते हुए उनके अधिवक्ता सुशील त्रिपाठी ने स्थिति को कानूनी दृष्टि से स्पष्ट किया। उन्होंने बेंच को अवगत कराया कि दुर्घटनाग्रस्त बस म प्र सड़क परिवहन निगम के साथ विधिवत अनुबंधित होकर संचालित हो रही थी। इस स्थिति में वाहन मालिक के लिए अलग से परमिट लेना अनिवार्य नहीं था। चूंकि गाड़ी का वैधानिक इंश्योरेंस विधिवत जारी था, इसलिए अनुबंध के आधार पर कंपनी मुआवजे की भरपाई से बच नहीं सकती। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार कर कंपनी की आपत्ति को खारिज कर दिया।
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