
कोलकाता। पश्चिम बंगाल (West Bengal) के चुनावी मैदान में इस बार भवानीपुर (Bhabanipur) और नंदीग्राम (Nandigram) सीटों ने हाईवोल्टेज राजनीति की तस्वीर पेश की है। हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर वोटों के बिखराव की संभावना बढ़ा दी है। वहीं नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) की सभा के बाद तृणमूल उम्मीदवार पवित्र कर के घर के बाहर ‘चोर-चोर’ के नारे लगाने से सियासी तापमान और बढ़ गया है।
मतदाता सूची का असर
मतदाता सूची संशोधन (एसआईआर) की सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी होने से पहले लाखों नामों के जुड़ने और कटने को लेकर चुनाव आयोग अलर्ट मोड में है। इस बार मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि जमीनी तनाव, वोटों के सूक्ष्म गणित और प्रशासनिक सतर्कता के बीच तय होगा।
हाईवोल्टेज सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला
भवानीपुर और नंदीग्राम पहले से ही तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर का केंद्र रही हैं। लेकिन एजेयूपी ने इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारकर समीकरण और जटिल कर दिए हैं। भवानीपुर में पूनम बेगम और नंदीग्राम में शाहिदुल हक को मैदान में उतारकर हुमायूं ने संकेत दिया है कि उनकी रणनीति सीमित ही सही, लेकिन निर्णायक हस्तक्षेप की है।
भवानीपुर में मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक
भवानीपुर में ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है। इस सीट पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट बैंक परंपरागत रूप से तृणमूल के साथ रहा है। एजेयूपी की एंट्री इस वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। यदि हुमायूं का प्रभाव स्थानीय स्तर पर मजबूत न हुआ, तो तृणमूल को बड़ा नुकसान नहीं होगा, लेकिन मामूली वोट कटाव भी करीबी मुकाबले में फर्क डाल सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा को मिल सकता है।
नंदीग्राम में बहुकोणीय मुकाबला
नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच सीधी टक्कर की राजनीतिक विरासत रही है। वाम दल और आईएसएफ की मौजूदगी के बीच एजेयूपी की एंट्री विपक्षी वोटों के बिखराव की संभावना बढ़ा रही है। मुस्लिम और ग्रामीण वोट बैंक का विभाजन एजेयूपी उम्मीदवार के माध्यम से बढ़ सकता है, जिससे भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है, खासकर अगर तृणमूल विरोधी वोट एकजुट न हों।
विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि छोटी पार्टियों जैसे एजेयूपी का प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा ‘किंगमेकर’ का होता है। भले ही वे खुद न जीतें, लेकिन 2-5% वोट शेयर के जरिए नतीजे की दिशा बदल सकते हैं। भवानीपुर में यह तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है, जबकि नंदीग्राम में भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा पहुंचा सकता है।
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