
नई दिल्ली: कैंसर अभी भी दुनिया भर में एक जानलेवा बीमारी (life-threatening illness) है और भारत भी इससे अछूता नहीं है. बढ़ते मामलों के चलते वैसा इलाज चाहिए जो हर व्यक्ति के जीन और टिशू (Genes and tissues) के अनुकूल हो. इस ज़रूरत को देखते हुए आईआईटी मद्रास ने एक नई पहल की है, एक कैंसर जीनोम और टिशू बैंक बनाकर, जो भारत में पर्सनलाइज्ड (व्यक्ति-विशेष) कैंसर उपचार को एक नई राह दे सकती है.
सवाल आता हो कि कैसे करेगा काम ये बैंक? तो इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य है देश भर के कैंसर रोगियों से लगभग 7,000 ट्यूमर सैंपल्स इकट्ठे करना और उन्हें लैब में बढ़ाना. इन नमूनों पर अलग-अलग थेरेपी ट्राय की जाएगी, ताकि यह देखा जाए कि किस थेरेपी का कौन से रोगी पर सबसे असर है. इस तरह, डॉक्टर अनुमान लगाने की बजाय पहले यह जान सकेंगे कि किस इलाज से बेहतर परिणाम मिलेंगे.
आईआईटी मद्रास की टीम ने पहले ही एक दिलचस्प खोज की है. आपको बता दें कि एक स्तन कैंसर में ऐसा म्यूटेशन पाया है जो भारत में ज्यादा आम है, जबकि पश्चिमी देशों में नहीं. इससे यह पता चलता है कि सिर्फ विदेशी जीनोमिक डेटा पर भरोसा करना सही नहीं है, बल्कि भारत-विशिष्ट अध्ययन ज़रूरी हैं.
यह कैंसर जीनोम-टिशू बैंक भारत के एटलस (Bharat Cancer Genome Atlas) से जुड़ा है. इस डेटाबेस में भारत के कई कैंसर मामलों का जीनोमिक डेटा शामिल किया जाएगा. यह इंफॉर्मेशन डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को मदद करेगी कि कौन सी दवाएं और इलाज कैसे काम करें. इस पहल का एक बड़ा मकसद है प्रिसिजन मेडिसिन लाना यानी ऐसा इलाज जो हर रोगी की जीन और बॉडी प्रोफ़ाइल को ध्यान में रखते हुए तय किया जाए.
इससे इलाज अधिक असरदार होगा, साइड इफेक्ट कम होंगे और मरीज को बेहतर जीवन मिलेगा. कैंसर जीनोम और टिशू बैंक जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि हर इंसान के डीएनए अलग होते हैं. कैंसर भी अलग अलग लोगों में अलग तरीकों से बढ़ता है. अभी तक ज्यादातर इलाज विदेशी रिसर्च और डेटा पर होते हैं, जबकि भारतीयों के जीन और टिश्यूज में अंतर पाया जाता है.
अगर भारतीयों के पास अपना डेटा और टिश्यू बैंक होगा तो डॉक्टर और वैज्ञानिकों को समझने में आसानी होगी कि किस तरह का कैंसर ज्यादा होता है और कौन सी दवा या थेरेपी बेहतर असर करेगी. दूसरा कारण है कि कैंसर के इलाज में समय और सटीकता बहुत मायने रखती है. अगर डॉक्टरों के पास पहले से जानकारी होती कि किस मरीज को कौन सी दवा कितनी असरदार होती, तो इलाज में देरी नहीं होगी और सही दवा और थेरेपी भी दी जा सकेगी.
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