
इंदौर। प्रदेश सरकार द्वारा आम नागरिकों की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए शुरू की गई मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में इंदौर शहर के ही 20 हजार 549 नागरिकों ने मुख्यमंत्री से अपनी सुनवाई नहीं होने की शिकायत दर्ज कराई है। 5 से ज्यादा विभागों में शिकायतों का अंबार लगा हुआ है और समाधान की रफ्तार बेहद धीमी नजर आ रही है। सबसे गंभीर स्थिति पुलिस विभाग की सामने आई है। इंदौर में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद जहां कानून-व्यवस्था में सुधार के दावे किए गए थे, वहीं हकीकत इसके उलट दिखाई दे रही है।
स्थानीय लेवल के अधिकारियों द्वारा सुनवाई नहीं करने की सूरत में मुख्यमंत्री तक शिकायत करने का आम जनता का पावर भी अब काम नहीं कर रहा है। इंदौर जिले में पिछले एक महीने से शिकायतों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है, लेकिन निराकरण की रफ्तार बहुत धीमी होती जा रही है भागीरथपुरा के आवेदकों ने ही गंदे पानी को लेकर 25 दिसंबर से शिकायतें करना शुरू की थीं। लगभग 15 से ज्यादा शिकायतें पेंडिंग होती गईं। वहीं पुलिस विभाग ने अपने ही पुराने आंकड़ों को तोड़ते हुए 6262 शिकायतों का आंकड़ा छू लिया है। यह न केवल इंदौर, बल्कि प्रदेश स्तर पर भी चिंताजनक है। लोगों ने आरोप लगाया है कि सीएम हेल्पलाइन से सिर्फ संतुष्ट और असंतुष्ट का फीडबैक लेने के लिए ही फोन आते हैं।
आमजन का भरोसा डगमगा रहा
पुलिस से जुड़ी शिकायतों में एफआईआर दर्ज न होना, जांच में लापरवाही, कार्रवाई में देरी, थानों के चक्कर लगवाना और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं प्रमुख रूप से शामिल हैं। नागरिकों का कहना है कि पुलिस कमिश्नरी लागू होने के बाद व्यवस्था मजबूत होने के बजाय मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है, जिससे आमजन का भरोसा डगमगा रहा है। कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में भी सबसे ज्यादा मामले पुलिस के पहुंच रहे हैं। इन मामलों में कब्जे, मारपीट, प्रताडऩा, धोखाधड़ी की शिकायत कलेक्टर के समक्ष पहुंच रही है।
औपचारिक जवाब देकर मामलों को बंद करने की कोशिश
पुलिस के बाद नगरीय विकास एवं आवास विभाग (नगर निगम) दूसरे स्थान पर है। नगर निगम से जुड़ी 3813 शिकायतें मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर अब भी लंबित हैं। इनमें साफ-सफाई, पेयजल संकट, सीवर लाइन, सडक़, स्ट्रीट लाइट और अतिक्रमण जैसी बुनियादी सुविधाओं से संबंधित समस्याएं शामिल हैं। शिकायतकर्ता बताते हैं कि कई बार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद केवल औपचारिक जवाब देकर मामलों को बंद करने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा राजस्व विभाग में 2018, महिला एवं बाल विकास विभाग में 1753, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में 1406, किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग में 680 और ऊर्जा विभाग में 650 शिकायतें लंबित हैं। स्कूल शिक्षा, परिवहन, सामान्य प्रशासन, सामाजिक न्याय, श्रम और वन विभागों में भी सैकड़ों शिकायतें निपटारे का इंतजार कर रही हैं।
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