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सेक्युलर भारत में एक धर्म को सर्वोच्च बताने पर रोक हाई कोर्ट ने पादरी को लगाई फटकार

March 28, 2026


नई दिल्ली | इलाहाबाद हाई कोर्ट(Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी (Important Note) करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत (India) जैसे बहुधार्मिक और सेक्युलर देश (A Multi-religious and Secular Country) में कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि केवल उसका ही धर्म सत्य है (Dharma is truth.) और बाकी सभी गलत हैं अदालत ने यह टिप्पणी एक पादरी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए की जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को निरस्त करने की मांग की थी

मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़ा है जहां वर्ष 2023 में पादरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी आरोप था कि वह प्रार्थना सभाओं के दौरान यह कहते थे कि संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह ईसाई धर्म है साथ ही उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि वे अन्य धर्मों को नीचा दिखाते हैं जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं

न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है और यही इसकी मूल भावना है ऐसे में किसी एक धर्म को सर्वोच्च या एकमात्र सत्य बताना न केवल सामाजिक सद्भाव के खिलाफ है बल्कि कानून की दृष्टि में भी आपत्तिजनक हो सकता है अदालत ने यह भी कहा कि विविधता में एकता भारत की पहचान है और इसे बनाए रखना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है

अदालत ने विशेष रूप से आईपीसी की धारा 295ए का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी धर्म या उसके अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है पादरी के कथित बयान इस दायरे में आते हैं या नहीं इसका निर्णय निचली अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा

पादरी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को बेवजह परेशान किया जा रहा है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं उन्होंने कहा कि जांच के दौरान भी धर्मांतरण जैसे आरोप साबित नहीं हुए हैं और बिना निष्पक्ष जांच के ही चार्जशीट दाखिल कर दी गई है इसलिए मामला रद्द किया जाना चाहिए

वहीं सरकारी पक्ष ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामला बनता है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता अदालत ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि समन जारी करने या संज्ञान लेने के लिए प्रारंभिक साक्ष्य पर्याप्त होते हैं जिनका मूल्यांकन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है

 


  • अंततः अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और इसे खारिज किया जाता है इस फैसले के साथ ही अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान भारतीय समाज की आधारशिला है और इसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं होने दिया जा सकता

     

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