
नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र(United Nations,) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि(India’s Permanent Representative) राजदूत पर्वतनेनी हरीश(Ambassador Parvathaneni Harish,) ने सोमवार को सुरक्षा परिषद(Security Council) की खुली बहस में एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया अब संयुक्त राष्ट्र(United Nations) को अंतरराष्ट्रीय शांति (international peace)और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली संस्था के रूप में नहीं देखती। भारत ने साफ किया कि UN की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और इसके प्रमुख अंग सुरक्षा परिषद की प्रभावशीलता पर भी गंभीर शंका पैदा हो गई है।
भारत ने UN की साख पर उठाए सवाल
हारीश ने ‘अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन की पुनः पुष्टि: शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के मार्ग’ विषय पर चर्चा के दौरान कहा कि, सार्वभौमिक सदस्यता वाले बहुपक्षवाद पर दबाव बढ़ रहा है।UN के सामने चुनौतियाँ केवल बजटीय नहीं, बल्कि संघर्षों से निपटने में जड़ता और प्रभावहीनता भी है।लोगों की बढ़ती धारणा है कि UN अब शांति और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता।
अब बहुपक्षीय चर्चाएँ “समानांतर ढांचों” में हो रही हैं
हारीश ने कहा कि शांति और सुरक्षा के परिणाम अब UN के ढांचे से बाहर मिलने लगे हैं। चर्चाएँ समानांतर बहुपक्षीय ढांचों की ओर बढ़ रही हैं, जिसमें कई बार निजी क्षेत्र के पार्टनर भी शामिल होते हैं। इसका मतलब साफ है:
विश्व स्तर पर UN की केंद्रीयता घट रही है, और नए मंच बन रहे हैं।
UN सुरक्षा परिषद की भूमिका पर प्रश्न
भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब UN और सुरक्षा परिषद की वैश्विक संघर्षों को रोकने और सुलझाने की क्षमता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।विशेषकर यूक्रेन, गाजा और अन्य वैश्विक टकरावों में सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता और निर्णय क्षमता की कमी को कई देशों ने आलोचना की है।
ट्रंप का “शांति बोर्ड” UN का विकल्प?
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में गाजा के लिए ‘शांति बोर्ड’ की घोषणा की, जिसे कई जगह UN के विकल्प या प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है।ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वैश्विक नेताओं को अपने ‘शांति बोर्ड’ में शामिल होने का आमंत्रण दिया है।
ट्रंप बोर्ड में शामिल देशों में शामिल हैं
अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाखस्तान, कोसोवो, मंगोलिया, मोरक्को, पाकिस्तान, पैराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, UAE, उज़्बेकिस्तान आदि।
भारत का कानून-शासन पर जोर
हारीश ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का शासन निरंतरता, वस्तुनिष्ठता और पूर्वानुमेयता पर आधारित होना चाहिए।उन्होंने दोहरी मानदंडों (Double Standards) की कड़ी आलोचना की और कहा कि,अंतरराष्ट्रीय कानून का उपयोग किसी देश की संप्रभुता पर सवाल उठाने या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए नहीं होना चाहिए।
भारत अपने संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और न्याय तक पहुंच बढ़ाने वाली पहलों के जरिए कानून के शासन को अपनी राष्ट्रीय आधारशिला मानता है।यही दृष्टिकोण भारत की अंतरराष्ट्रीय नीति को भी दिशा देता है।
UN को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए सुधार जरूरी
भारत ने सुरक्षा परिषद के ढांचे में व्यापक सुधार की तत्काल आवश्यकता पर भी जोर दिया। हारीश ने कहा कि यदि UN और सुरक्षा परिषद समकालीन वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं कर पाएंगे, तो उनकी प्रासंगिकता घटती जाएगी।उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के शासन को लागू किए बिना यह निष्प्रभावी है और इसी कारण वैश्विक शासन ढांचे को सुधार की दिशा में आगे बढ़ना होगा।भारत ने UN की शांति-निर्माण क्षमता पर सख्त सवाल उठाए और कहा कि वैश्विक शांति सुनिश्चित करने में UN अब उतनी प्रभावी नहीं रह गई।इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून का निष्पक्ष और निरपेक्ष पालन और सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग की।यह बयान उस समय आया है जब दुनिया में नए बहुपक्षीय ढांचे बन रहे हैं और UN के विकल्प भी तेजी से उभर रहे हैं।
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