
दुग्ध समितियों को छोडक़र उत्पादकों और वितरकों के लिए शासन ने लिया निर्णय
मिलावट रोकने के लिए पहली बार शुरू की सख्त पहल
इंदौर। यह पहला मौका है जब दूध उत्पादकों (Milk producers) और वितरकों (Distributors) को लाइसेंस (License) लेना पड़ेगा। डेयरी सहकारी समितियों (Dairy Cooperative Societies) के लिए यह अनिवार्यता नहीं रहेगी और अब शासन ने इसके पंजीयन की प्रक्रिया भी शुरू कराई है। इसका उद्देश्य मिलावटी दूध और उससे बने उत्पादों पर रोक लगाना है, ताकि ऐसे उत्पादकों और वितरकों की पहचान की जा सके जो इन कार्यों में लिप्त हैं।
प्रदेशभर में दूध की उत्पादन क्षमता भी बढ़ाई जाना है। अभी पूरे प्रदेश में लगभग 213 लाख टन दूध का उत्पादन होता है और सांची दूध एक बड़ा डेयरी ब्रांड है। ग्रामीण क्षेत्र में दूध संग्रह को बढ़ावा देने के लिए 381 नई सहकारी समितियां भी बनाई गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दूध उत्पादन को 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का अनुबंध किया है और पिछले साल नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड के साथ प्रदेश सरकार ने अनुबंध भी किया। दरअसल भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने दूध उत्पादकों और वितरकों के लिए पंजीयन करने और लाइसेंस अनिवार्य करने के संबंध में एडवाइजरी जारी की है, जिसके चलते अब मध्यप्रदेश में भी इसे लागू किया जा रहा है। लिहाजा अब इंदौर सहित प्रदेशभर में दूध उत्पादकों और विक्रेताओं को लाइसेंस लेना पड़ेगा। केन्द्र सरकार को भी इसकी रिपोर्ट देना होगी।
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