नई दिल्ली। दुनिया में नाम कमाने की चाहत लोगों को कभी-कभी ऐसे कदम उठाने पर मजबूर कर देती है, जो सुनने में भी अविश्वसनीय लगते हैं। ऐसा ही एक मामला डबलिन (Dublin) में रहने वाले मजदूर माइक मिनी का है, जिन्होंने खुद को 61 दिनों तक ताबूत में जिंदा दफन करवा लिया। यह सब उन्होंने पहचान और शोहरत हासिल करने के लिए किया था।
कैसे आया जिंदा दफन होने का विचार?
माइक मिनी एक साधारण परिवार से थे और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद काम की तलाश में इंग्लैंड पहुंचे। उनका सपना बॉक्सिंग चैंपियन बनने का था, लेकिन हाथ में चोट लगने से यह सपना टूट गया। बाद में सुरंग खोदते समय मिट्टी में दबने की घटना ने उनके मन में ‘जिंदा दफन’ होने का विचार पैदा किया। उस दौर में यूरोप और अमेरिका में ऐसे स्टंट लोकप्रिय थे और माइक ने इसे ही अपनी पहचान बनाने का जरिया बना लिया।
1968 में शुरू हुआ अनोखा स्टंट
सांस लेने के लिए पाइप
खाने-पीने की व्यवस्था
किताबें और सिगरेट
बाहर बात करने के लिए टेलीफोन
भी लगाया गया था। लोग पैसे देकर उनसे बातचीत करते थे। यह पूरा आयोजन एक सार्वजनिक शो जैसा बन गया और भारी भीड़ उमड़ी। माइक ने जमीन के नीचे कुल 61 दिन बिताए।
बाहर निकले तो देखने उमड़ी भीड़
करीब आठ सप्ताह बाद जब माइक बाहर निकले तो वे कमजोर और थके हुए दिखे, लेकिन स्वस्थ थे। उन्होंने खुद को विजेता बताया और इस कारनामे से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरीं। उन्हें बड़ी रकम और वर्ल्ड टूर का वादा भी किया गया था।
आखिर क्या मिला?
इतना बड़ा जोखिम उठाने के बावजूद माइक मिनी को न तो वादा किया गया पैसा मिला और न ही अपेक्षित शोहरत। Guinness World Records ने भी उनके रिकॉर्ड को आधिकारिक मान्यता नहीं दी। कुछ समय बाद उनका रिकॉर्ड भी टूट गया और वे फिर गुमनामी में लौट गए।
यह घटना आज भी सवाल खड़ा करती है—क्या सिर्फ पहचान पाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना सही है?
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