
नई दिल्ली: दिग्गज एक्ट्रसे और लावणी कलाकार मधु कांबीकर (Madhu Kambikar) का 12 अक्टूबर 2026 को 73 साल की उम्र में निधन हो गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने पुणे में अंतिम सांस ली. वह लंबे समय से बीमार थीं. उनके जाने से मराठी मनोरंजन जगत में शोक की लहर है. मराठी फिल्मों से लेकर थिएटर और टेलीविजन तक अपनी कला का जादू बिखेरने वाली मधु कांबीकर अब हमारे बीच नहीं रहीं. चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने कई यादगार किरदार निभाए. अभिनय के साथ-साथ महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला, खासकर लावणी को लोकप्रिय बनाने में भी उनका अहम योगदान रहा.
मधु कांबीकर पिछले करीब एक दशक से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर थीं. 27 नवंबर 2016 को मुंबई के माटुंगा स्थित यशवंत नाट्य मंदिर में आयोजित एक ‘लावण्य संगीत’ कार्यक्रम के दौरान वह प्रस्तुति दे रही थीं. तभी अचानक मंच पर बेहोश होकर गिर पड़ीं. इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें कथित तौर पर स्ट्रोक आया था. इस घटना के बाद उनकी सेहत लगातार चर्चा का विषय बनी रही और वह बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गईं. इसके बाद से उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुतियां देना बंद कर दिया था.
CM देवेंद्र फडणवीस ने जताया दुख, याद किए यादगार किरदार
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मधु कांबीकर के निधन पर दुख जताया. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने मराठी सिनेमा, लोकनाट्य, व्यावसायिक रंगमंच और टेलीविजन में उनके योगदान को याद किया. उन्होंने ‘हेच माझं माहेर’, ‘रघुमैना’, ‘एक होता विदूषक’, ‘झपाटलेला’, ‘देबू’ और ‘येऊ का घरात’ जैसी फिल्मों में उनके काम का जिक्र किया. मुख्यमंत्री ने कहा कि अभिनय और नृत्य के खूबसूरत मेल से मधु कांबीकर ने ग्रामीण जीवन से जुड़ी लोककलाओं को लोकप्रिय बनाने की लगातार कोशिश की.
उन्होंने यह भी कहा कि चार दशक से ज्यादा समय तक कला और मनोरंजन की दुनिया में सक्रिय रहकर मधु कांबीकर ने मराठी इंडस्ट्री को समृद्ध किया. उनकी अनमोल विरासत को हमेशा याद रखा जाएगा. ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने भी उनके निधन पर गहरा दुख जताया. मधु कांबीकर ने अपने लंबे करियर में अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर दर्शकों के बीच अपनी खास पहचान बनाई. वह सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि रंगमंच और टेलीविजन पर भी सक्रिय रहीं.
फिल्म ‘शापित’ में उनके अभिनय को काफी पहचान मिली. वहीं ‘एक होता विदूषक’ और ‘झपाटलेला’ जैसी फिल्मों में उनके काम को भी याद किया जाता है. उनके अभिनय की खासियत थी कि वह अपने किरदारों में सहजता और प्रभाव दोनों लेकर आती थीं. मधु कांबीकर की पहचान सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर नहीं थी. वह महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला लावणी से भी गहराई से जुड़ी थीं. अभिनय और नृत्य के जरिए उन्होंने इस कला को दर्शकों तक पहुंचाने में योगदान दिया. लावणी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है. मधु कांबीकर ने अपने काम के जरिए ग्रामीण जीवन, लोकपरंपराओं और क्षेत्रीय संस्कृति को मंच पर जगह दी.
उनके निधन से मराठी मनोरंजन जगत ने एक ऐसी कलाकार को खो दिया है, जिसने अपनी कला के जरिए कई पीढ़ियों के दर्शकों से रिश्ता बनाया. उनकी फिल्में, मंचीय प्रस्तुतियां और लोककला के प्रति समर्पण हमेशा याद किए जाएंगे. मधु कांबीकर भले ही इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन मराठी सिनेमा और लावणी की दुनिया में उनका योगदान लंबे समय तक जिंदा रहेगा.
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