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तेल की कीमतों ने बढ़ाई बाजार की टेंशन, सोना शेयर और म्यूचुअल फंड में भारी उतार चढ़ाव

March 16, 2026

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेश बाजारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेज उछाल के कारण सोना, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) और अन्य निवेश विकल्पों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह दुर्लभ स्थिति है जब लगभग सभी एसेट क्लास (Asset Class) पर एक साथ दबाव बना हुआ है और निवेशकों को हर मोर्चे पर झटका लग रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस अस्थिरता के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की तेजी से बढ़ती कीमतें हैं। मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने के बाद से तेल के दाम चार साल के उच्च स्तर तक पहुंच गए हैं। संघर्ष शुरू होने के समय कच्चे तेल की कीमत लगभग 72.48 डॉलर प्रति बैरल थी लेकिन नौ मार्च तक इसमें करीब 65 प्रतिशत की उछाल दर्ज की गई और यह 119.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। बाद में कीमतों में कुछ गिरावट आई लेकिन तेल फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलमार्ग से तेल की आपूर्ति चार से आठ सप्ताह तक बाधित रहती है तो कच्चे तेल की कीमत 110 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देशों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है। एक तरफ शेयर बाजार में भारी गिरावट का जोखिम रहेगा और दूसरी तरफ महंगाई भी तेजी से बढ़ सकती है।

मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष ने निवेश जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय इक्विटी शेयर म्यूचुअल फंड मुद्रा बाजार बॉन्ड और कमोडिटी जैसे कई वित्तीय निवेश विकल्पों में अस्थिरता बढ़ गई है। वैश्विक स्तर पर जब भी युद्ध या तनाव की स्थिति बनती है तो निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं। यही कारण है कि शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक इस महीने विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 52 हजार 704 करोड़ रुपये की बिकवाली की है। उभरते बाजारों की तुलना में भारत से कमजोर रिटर्न की धारणा भी विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कम होने का एक कारण बताई जा रही है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारतीय बाजार पहले भी कई बड़े संकटों से उबर चुका है। पिछले 15 वर्षों में वैश्विक आर्थिक संकट महामारी और कई भू राजनीतिक तनावों के बावजूद भारतीय बाजारों ने मजबूत वापसी की है। कोविड संकट के दौरान भारी गिरावट के बाद भी भारतीय बाजारों ने अगले कुछ वर्षों में लगभग 21 से 22 प्रतिशत तक का मुनाफा दिया था।

दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बावजूद सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। फरवरी के अंत से अब तक सोना लगभग छह प्रतिशत और चांदी करीब नौ प्रतिशत तक टूट चुकी है। इसके पीछे प्रमुख कारण डॉलर की मजबूती को माना जा रहा है। चूंकि कच्चे तेल का कारोबार मुख्य रूप से डॉलर में होता है इसलिए तेल की कीमत बढ़ने पर डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है। जब डॉलर मजबूत होता है तो सोने की कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है।

शेयर बाजार की बात करें तो मार्च महीने में अब तक घरेलू बाजार करीब आठ प्रतिशत तक गिर चुके हैं। पिछले सप्ताह में ही पांच प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई जो पिछले कई वर्षों में किसी एक सप्ताह में सबसे बड़ी गिरावटों में से एक मानी जा रही है। ऑटो बैंकिंग मेटल और कंज्यूमर सेक्टर के शेयरों पर सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज जलमार्ग अगले दस दिनों तक भी बाधित रहता है और कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता है तो वैश्विक शेयर बाजारों में लगभग 10 प्रतिशत तक की और गिरावट आ सकती है। इसका सीधा असर भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।

म्यूचुअल फंड निवेश पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। आंकड़ों के अनुसार फरवरी महीने में करीब 65.7 लाख नए एसआईपी खाते खुले लेकिन लगभग 49.7 लाख खाते बंद भी हो गए। इसके कारण एसआईपी स्टॉपेज अनुपात बढ़कर लगभग 76 प्रतिशत तक पहुंच गया है जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।

 


  • विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार का बड़ा हिस्सा डॉलर बॉन्ड और तेल से जुड़े निवेश विकल्पों की ओर जा रहा है। यदि वैश्विक तनाव और बढ़ता है तो सोना चांदी और शेयर बाजार में आने वाले समय में और ज्यादा उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

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