
इस्लामाबाद. सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) पर जब हेकड़ी निकल गई तो अब पाकिस्तान (Pakistan) गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है. विवाद के बीच पाकिस्तान ने भारत (India) को फिर से गीदड़भभकी (empty threats) दी है. शहबाज सरकार में जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा कि इस्लामाबाद उन ‘हाथों को काट देगा’ जो सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान के हिस्से पर दावा करने की कोशिश करेंगे.
मलिक की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दशकों पुरानी सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव गहरा गया है. साल 2025 में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत ने संधि को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था.
सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार के साथ जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुसादिक मलिक ने कहा, ‘हम ऐलान कर चुके हैं कि जो हमारे पानी पर हाथ डालेगा, वो हाथ ही काट देंगे. सिर्फ ऐलान नहीं कर चुके, पिछले डेढ़-दो साल में दो मर्तबा दिखा चुके… लेकिन सवाल इंसाफ का भी तो है. हम तो अपने आपको बचा लेंगे. हमने तो दो बार दिखाया कि अगर हवा के ऊपर भी हाथ डालोगे तो तुम्हारा हाथ पकड़ लेंगे… क्या ये ये हक सबको मिल गया है ऊपर में रहने वाले लोग ढलान में रहने वाले लोगों का पानी रोक सकेंगे, क्या ये हक दे दिया गया दुनिया को…’
मुसादिक मलिक ने दोहराया कि पाकिस्तान संधि के तहत अपने हिस्से के पानी की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. भारत को पाकिस्तान के लिए निर्धारित जल प्रवाह को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
भारत ने क्या लिया फैसला?
मंत्री के भड़काऊ बयान के बीच पाकिस्तान खुद को एक पीड़ित के रूप में पेश करने की कोशिश में जुटा है. आसान भाषा में समझें तो भारत ने सिंधु नदी का पूरा पानी नहीं रोका है. असलियत यह है कि सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों का जल प्रवाह आज भी पाकिस्तान की तरफ जा रहा है.
दरअसल भारत ने सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को मिलने वाले सपोर्ट सिस्टम को खत्म कर दिया है. नदी के जल प्रवाह को लेकर दोनों मुल्कों के बीच बातचीत होती थी. संदेश एक दूसरे को भेजे जाते थे. जल प्रवाह, बांधों, परियोजनाओं और जल प्रबंधन को लेकर लगातार संपर्क होता था. अब भारत ने इसी सपोर्ट पर रोक लगा रखी है.
क्या है सिंधु जल समझौता?
सिंधु जल समझौता 1960 में हुआ था. इसे विश्व बैंक ने करवाया था. इस समझौते का मकसद ये था कि भारत और पाकिस्तान आपस में सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों का पानी कैसे बांटेंगे, इसका हिसाब किताब तय हो जाए. यानी कौन सी नदी का पानी किसे मिलेगा, कौन कितना इस्तेमाल करेगा. ये सब इसी समझौते से तय होता आ रहा था. 1960 से लेकर अब तक यही समझौता दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को कंट्रोल करता रहा है.
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved