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कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद भारत में क्यों नहीं घटे पेट्रोल-डीजल के दाम? जानें इसके पीछे की वजह

June 29, 2026

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल (Crude oil) की कीमतों में तेज गिरावट के बावजूद भारत (India) में पेट्रोल और डीजल (Petrol and Diesel) के दामों में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। ब्रेंट क्रूड, जो युद्ध के दौरान करीब 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, अब घटकर लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है। इसके बावजूद भारत में ईंधन की खुदरा कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।

इस स्थिति की तुलना में पाकिस्तान, भूटान, म्यांमार, नेपाल और चीन जैसे देशों में हाल के दिनों में पेट्रोल-डीजल के दामों में कटौती देखने को मिली है। उदाहरण के तौर पर पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत लगभग 130 रुपये से घटकर 101 रुपये प्रति लीटर के करीब आ गई है, जबकि भारत में औसत कीमत लगभग 108 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है।

पड़ोसी देशों में भी दिखी गिरावट
भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में भी हाल ही में पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी दर्ज की गई है। डीजल के मामले में भी पाकिस्तान और चीन जैसे देशों में बड़ी कटौती देखने को मिली है।


  • भारत में कीमतें क्यों स्थिर हैं?
    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप नहीं बदलतीं। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी थीं, तब सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने लंबे समय तक कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इस दौरान कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसका अनुमान करीब एक लाख करोड़ रुपये तक लगाया जा रहा है।

    अब जब कच्चे तेल के दाम नीचे आए हैं, तो कंपनियां पहले अपने उस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर रही हैं, इसलिए फिलहाल खुदरा कीमतों में कटौती नहीं की जा रही है।

    कंपनियों को नुकसान की भरपाई में समय
    तेल क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर स्थिर रहती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियों को अपने पुराने नुकसान की भरपाई करने में लगभग दो से तीन महीने का समय लग सकता है। इसके बाद ही पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती की संभावना बन सकती है।

    सरकारी टैक्स और नीति का असर
    एक और अहम कारण टैक्स संरचना भी है। सरकार ने पिछले महीनों में एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 10-10 रुपये की कटौती की थी, जिससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिली, लेकिन इससे राजस्व में भी भारी कमी आई। विशेषज्ञों के अनुसार, चुनावी अवधि के दौरान कीमतों को स्थिर रखने की नीति और बाद में टैक्स समायोजन के कारण भी खुदरा ईंधन कीमतों में तत्काल बदलाव नहीं किया जाता।

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