
नई दिल्ली। रमजान (Ramadan) का पाक महीना रहमत, बरकत और मगफिरत का प्रतीक माना जाता है। इस महीने मुस्लिम समुदाय (Muslim community) के लोग रोजा (Roza) रखकर और इबादत में लगकर अल्लाह की मुरादें पाते हैं। जबकि पूरे रमजान का हर दिन महत्वपूर्ण है, अखिरी दस दिन, यानी तीसरा अशरा, विशेष महत्व रखता है। इसी दौरान एतकाफ का अमल किया जाता है, जो बेहद रूहानी और सवाब वाला माना जाता है।
एतकाफ का मतलब और तरीका
एतकाफ का अर्थ है मस्जिद में एकांतवास कर पूरी तरह इबादत में मग्न होना। आमतौर पर पुरुष 20वें रोज़े के बाद यानी 21वीं रात से मस्जिद के एक कोने में एतकाफ में बैठते हैं और ईद तक वहीं रहते हैं। इस दौरान व्यक्ति 24 घंटे नमाज़, कुरआन की तिलावत, ज़िक्र और दुआ में अपना वक्त बिताता है।
मस्जिद से बाहर निकलना मना
एतकाफ के दौरान बिना विशेष कारण मस्जिद से बाहर निकलना वर्जित होता है। दुनियावी काम, बेवजह बातचीत और मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता, ताकि इबादत में कोई बाधा न आए। इसका उद्देश्य है कि व्यक्ति पूरी तरह अल्लाह की याद और अपने गुनाहों की माफी में मग्न हो जाए।
शब-ए-कद्र की तलाश
रमज़ान के आखिरी दस दिन में मुसलमान शब-ए-कद्र की तलाश करते हैं, जिसे हज़ार महीनों से बेहतर रात कहा गया है। माना जाता है कि इस रात की गई इबादत और दुआएं सीधे अल्लाह तक पहुँचती हैं और उनके बंदों पर विशेष रहमत नाज़िल होती है।
महिलाओं के लिए एतकाफ
जहां पुरुष मस्जिद में एतकाफ करते हैं, वहीं महिलाएं घर में एक निश्चित स्थान पर इबादत में मग्न रह सकती हैं। एतकाफ का यह अमल आत्मशुद्धि, सब्र और अल्लाह से नज़दीकी बढ़ाने का एक बेहतरीन तरीका है। इसे अपनाने से इंसान की रूहानी शक्ति और ईमान मजबूत होती है।
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