नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्ष एक बार फिर संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। सितंबर 2026 में यह मुद्दा इसलिए फिर गरम हुआ है क्योंकि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक जांच रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र किया गया। विपक्ष ने इसे CEC के खिलाफ नए सिरे से कार्रवाई का आधार बनाया है।
हालांकि, नोटिस देना और CEC को वास्तव में पद से हटाना दो अलग-अलग चरण हैं। संविधान में CEC को हटाने के लिए बेहद कठिन प्रक्रिया निर्धारित है। अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक CEC को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है।
इस प्रक्रिया को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण—नोटिस:
लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। मार्च 2026 में विपक्ष ने लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया था।
दूसरा चरण—जांच:
नोटिस स्वीकार होने के बाद आगे की प्रक्रिया Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत चलती है। आरोपों की जांच के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। केवल राजनीतिक आरोप या असहमति अपने आप में CEC को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं बनती।
तीसरा चरण—दोनों सदनों में विशेष बहुमत:
यदि जांच के बाद हटाने योग्य ‘proved misbehaviour or incapacity’ स्थापित होती है, तो दोनों सदनों को प्रस्ताव पारित करना होता है। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने की प्रक्रिया पूरी होती है।
मार्च 2026 में विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया था। दोनों नोटिस बाद में क्रमशः लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने खारिज कर दिए। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा था कि आरोप CEC को हटाने के लिए जरूरी प्रथमदृष्टया ‘misbehaviour’ साबित करने वाले पर्याप्त प्रमाण नहीं देते।
इसके बाद 24 अप्रैल 2026 को 73 राज्यसभा सांसदों ने नौ आरोपों के साथ नया नोटिस दिया था। यह नोटिस CEC के कथित आचरण और SIR समेत कई मुद्दों से संबंधित था।
सितंबर में विपक्ष ने नए सिरे से दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू की है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक प्रस्ताव को कानूनी विशेषज्ञों की सलाह से तैयार किया जा रहा है। इसकी पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े निर्णयों पर दर्ज आपत्तियों की ‘इंडियन एक्सप्रेस’ रिपोर्ट भी है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 महीनों में आयोग के दो अन्य सदस्यों ने SIR से जुड़े मामलों में कम से कम 14 बार सवाल या सुझाव दर्ज किए थे।
यहां नोटिस की संख्या और अंतिम मतदान की संख्या को अलग-अलग देखना जरूरी है।
विपक्ष के लिए 100 लोकसभा और 50 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर जुटाना नोटिस देने के लिए पर्याप्त है। मार्च में वह संख्या जुटाई भी जा चुकी थी। लेकिन CEC को हटाने के अंतिम प्रस्ताव के लिए दोनों सदनों में संविधान में निर्धारित विशेष बहुमत चाहिए।
इसलिए केवल विपक्षी दलों के मौजूदा संख्याबल से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि CEC को पद से हटाया जा सकता है। अंतिम प्रस्ताव तभी पारित होगा जब दोनों सदनों में आवश्यक संवैधानिक बहुमत हासिल हो। इसके लिए सत्तारूढ़ गठबंधन से भी पर्याप्त संख्या में सांसदों का समर्थन मिलना आवश्यक हो सकता है, यह उस समय सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या पर भी निर्भर करेगा।
विपक्ष CEC पर पक्षपात और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोप लगा रहा है। दूसरी ओर, अप्रैल में प्रस्ताव खारिज करते हुए राज्यसभा सभापति ने कहा था कि लगाए गए आरोप हटाने के लिए आवश्यक प्रथमदृष्टया ‘misbehaviour’ की कसौटी पूरी नहीं करते। इसलिए इन आरोपों को विपक्ष के आरोप और राजनीतिक विवाद के रूप में अलग-अलग समझना जरूरी है; इन्हें सिद्ध तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
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