
नई दिल्ली. भारत (India) के तेल आयात (Oil Imports) में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। फरवरी महीने में रूस (Russia) को पीछे छोड़ते हुए इराक (Iraq) भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च में रूस फिर से पहले स्थान पर आ सकता है। फरवरी में रूस से तेल आयात में 32 फीसद की गिरावट आई। आयात घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया।
वहीं इराक से आयात बढ़कर 11.8 लाख बैरल प्रति दिन पहुंच गया। सऊदी अरब से भी आयात बढ़कर करीब 9.98 लाख बैरल प्रति दिन हो गया। इस दौरान भारत के कुल तेल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी बढ़कर 59 फीसद हो गई। फरवरी में ब्राजील भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बनकर उभरा। वैश्विक तनाव और सप्लाई में बदलाव के बीच भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की रणनीति अपना रहा है। इसमें रूस की भूमिका फिर से मजबूत होती दिख रही है।
क्यों बढ़ रहा है रूसी तेल का आयात
पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलसंधि में बाधा के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके बाद भारत फिर से रूस से ज्यादा तेल खरीदने लगा है। मार्च में रूस से तेल आयात बढ़कर 18 से 22 लाख बैरल प्रति दिन तक पहुंच सकता है। इसके पीछे अमेरिकी फैसले की भी अहम भूमिका है। अमेरिका ने 6 मार्च को भारत के लिए रूसी तेल पर कुछ प्रतिबंधों में छूट दी। इससे आयात बढ़ने में मदद मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि सस्ती कीमत और स्थिर सप्लाई के कारण रूस भारत की तेल आयात रणनीति में अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
180 डॉलर के पार पहुंच सकता है क्रूड
सऊदी अरब के अधिकारियों का अनुमान है कि अगर ईरान युद्ध और उससे पैदा हुई ऊर्जा संकट की स्थिति अप्रैल के अंत तक जारी रहती है, तो कच्चे तेल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है। यह जानकारी द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। खासतौर पर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। सऊदी अरब के ये अनुमान रियाद में बढ़ती चिंता को उजागर करते हैं।
एक फीसदी टूटा तेल
शुक्रवार को तेल की कीमतें एक फीसद से ज्यादा गिर गईं, क्योंकि अमेरिका ने तेल सप्लाई संकट को संभालने के लिए कदम उठाए। प्रमुख यूरोपीय देशों, जापान और कनाडा ने होर्मुज जलसंधि से जहाज़ों के सुरक्षित गुजरने को सुनिश्चित करने के प्रयासों में शामिल होने की पेशकश की। इसके बाद मई के लिए ब्रेंट क्रूड वायदा 1.58 डॉलर या 1.45 फीसदी गिरकर 107.07 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया।
युद्ध जारी रहा तो क्या होगा?
ईरान, इस्राइल और अमेरिका से जुड़े इस संघर्ष ने खाड़ी क्षेत्र में प्रमुख ऊर्जा बुनियादी ढांचे को पहले ही बाधित कर दिया है। अगर पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है। पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हालात जल्द नहीं सुधरे तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित ही नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा।
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