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सुप्रीम कोर्ट का NHAI को सख्त निर्देश: हर 50 किलोमीटर पर गौशाला बनाओ, CSR से आवारा जानवरों की देखभाल करें

January 30, 2026

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट(The Supreme Court) ने NHAI के अधिवक्ता(lawyer) से कहा कि आप ठेकेदारों से यह भी कह सकते हैं कि वे लगभग 50 किलोमीटर के बाद एक गौशाला(cow shelte) स्थापित करें जहां कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व(corporate social responsibility) के तहत इन आवारा जानवरों की देखभाल की जा सके।

सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण(National Highways Authority of India) (NHAI) (NHAI) को गुरुवार को कहा कि वह सड़क निर्माण में शामिल ठेकेदारों से राजमार्गों पर आने वाले आवारा पशुओं की देखभाल के लिए कंपनियों के सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत गौशाला बनाने पर विचार करने को कहे। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ(Justices Vikram Nath), न्यायमूर्ति संदीप मेहता(Sandeep Mehta) और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों के स्थानांतरण(sterilization of stray dogs) और बधियाकरण संबंधी शीर्ष न्यायालय के सात नवंबर के आदेश में संशोधन का अनुरोध करने वाली कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायायल ने हालांकि पंजाब(Punjab), राजस्थान(Rajasthan), उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु द्वारा उसके निर्देशों के अनुपालन को लेकर असंतोष व्यक्त किया।

न्यायालय ने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा प्रतिदिन 100 आवारा कुत्तों का बधियाकरण करने के प्रयास अपर्याप्त हैं और यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। पीठ ने एनएचएआई की ओर से पेश अधिवक्ता से एक ऐप विकसित करने को भी कहा, जहां लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों को देखे जाने की सूचना दे सकें। न्यायालय ने अधिवक्ता से कहा, ‘‘आप ठेकेदारों से यह भी कह सकते हैं कि वे लगभग 50 किलोमीटर के बाद एक गौशाला स्थापित करें जहां कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत इन आवारा जानवरों की देखभाल की जा सके।’’अधिवक्ता ने ऐप विकसित करने और ठेकेदारों से गौशालाएं स्थापित करने के लिए कहने की संभावना पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की।


  • एनएचएआई के अधिवक्ता ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1300 से अधिक संवेदनशील स्थान हैं और प्राधिकरण सड़क दुर्घटनाओं से बचने के लिए इनसे निपट रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकांश राज्यों ने राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान जैसे कुछ राज्य अब भी इस समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आए हैं। राजस्थान की ओर से पेश हुई अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन के बारे में पीठ को बताया कि राज्य में बधियाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं और शैक्षणिक संस्थानों के क्षेत्रों की बाड़बंदी की गई है।

    पीठ ने इसपर रेखांकित किया कि राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए केवल 45 वैन हैं और यह अपर्याप्त है। न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल किया, ‘‘केवल जयपुर के लिए ही लगभग 20 वैन की आवश्यकता होगी। आपको सुविधाओं को बढ़ाना होगा और विभिन्न शहरों के लिए वाहनों की संख्या में वृद्धि करनी होगी। यह दलील दी गई है कि पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के तहत सीएसवीआर (पकड़ना, बधियाकरण करना, टीकाकरण करना और छोड़ना) फार्मूला लागू किया जाना चाहिए। अधिक वाहन और जनशक्ति के बिना आप इस कार्य को कैसे करेंगे?’’ भाटी ने कहा, ‘‘हमने इस मुद्दे से निपटने के लिए अधिक बजटीय आवंटन की मांग की है।’’

    पीठ ने कहा, ‘‘अगर आप आज इस समस्या का समाधान नहीं करेंगे तो यह बढ़ती ही जाएगी। हर साल आवारा कुत्तों की संख्या में 10-15 प्रतिशत तक वृद्धि होगी। इसे नजरअंदाज करके आप अपनी ही समस्या बढ़ा रहे हैं। जैसा कि पंजाब ने कहा, वे प्रतिदिन 100 कुत्तों का बधियाकरण कर रहे हैं। इसका कोई फायदा नहीं है। यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है।’’ भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) की ओर से पेश अधिवक्ता ने पीठ को सूचित किया कि पिछले साल सात नवंबर को शीर्ष अदालत के आदेश के बाद से गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ)और निजी पक्षों से बधियाकरण केंद्र और पशु आश्रय खोलने के लिए आवेदनों की संख्या में वृद्धि हुई है।


  • उन्होंने कहा, ‘‘कुछ आवेदन लंबित हैं। सात नवंबर के आदेश के बाद 250 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं… उन्हें अभी तक हमारी ओर से मान्यता नहीं दी गई है।’’ उन्होंने कई राज्य सरकारों द्वारा आवारा कुत्तों के बधियाकरण के संबंध में जारी आंकड़ों में विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक राज्य में कुत्तों की संख्या कम है जबकि बधियाकरण के आंकड़े अधिक हैं। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने पक्षकारों को यथाशीघ्र लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए एडब्ल्यूबीआई से कहा, ‘‘आपसे हमारा एकमात्र अनुरोध यह है कि जो भी आवेदन लंबित हैं, उन पर शीघ्रता से कार्रवाई की जाए। आप उन्हें स्वीकार करें या अस्वीकार करें, लेकिन निर्णय अवश्य लें।’’

    पीठ सात नवंबर, 2025 के उस आदेश में संशोधन का अनुरोध करने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अधिकारियों को संस्थागत क्षेत्रों और सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने 13 जनवरी को कहा था कि वह राज्यों से कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए ‘‘भारी हर्जाना’देने को कहेगी और ऐसे मामलों के लिए कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराएगी। शीर्ष अदालत ने पिछले पांच वर्षों से आवारा पशुओं से संबंधित मानदंडों के लागू न होने पर भी चिंता जताई। उच्चतम न्यायालय ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशन जैसे संस्थागत क्षेत्रों में कुत्ते के काटने की घटनाओं में ‘चिंताजनक वृद्धि’ पर संज्ञान लेते हुए सात नवंबर को निर्देश दिया कि आवारा कुत्तों को उचित बधियाकरण और टीकाकरण के बाद तुरंत निर्दिष्ट आश्रयों में स्थानांतरित किया जाए।

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