
नई दिल्ली (New Delhi)। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को कहा कि मॉब लिंचिंग (mob lynching) की घटनाओं को धर्म के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। मॉब लिंचिंग (mob lynching) और गाय रक्षा (cow protection) के नाम पर होने वाली हिंसा को रोकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राज्यों से छह हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई (Justice BR Gavai) की अगुआई वाली बेंच ने इस मामले में राज्य सरकारों से ऐक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है।
सुप्रीम कोर्ट में महिला संगठन की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में कहा गया है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग रोकने को आदेश जारी किया था, उस पर अमल किया जाना चाहिए। कोर्ट के पूछने पर याचिकाकर्ता ने बताया था कि याचिका में उदयपुर के कन्हैया लाल हत्याकांड का जिक्र नहीं है। इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सिलेक्टिव मत बनिए, क्योंकि यह मामला सभी राज्यों से जुड़ा है।
ज्यादातर राज्यों ने दायर नहीं किया हलफनामा
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि हमें दिख रहा है कि ज्यादातर राज्यों ने अभी तक हलफनामा दायर नहीं किया है। राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वह बताएं कि इस मामले में उन्होंने क्या ऐक्शन लिया है। छह हफ्ते के अंदर राज्यों को बताना है कि उन्होंने हिंसा को रोकने के लिए क्या कदम उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दिए निर्देश
याचिकाकर्ता के वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने आरोप लगाते हुए कहा कि मॉब लिंचिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का कई राज्यों द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि वह देश भर के राज्यों को निर्देश जारी करे कि वह डेटा अपलोड करें और नोडल ऑफिसर नियुक्त करें। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग रोकने के लिए 2018 में तहसीन पूनावाला केस में फैसला दिया था और गाइडलाइंस जारी किए थे। गाइडलाइंस के पालन के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि होम मिनिस्ट्री राज्यों के साथ मीटिंग करेगा और डेटा तैयार किया जाएगा। मामले की सुनवाई के दौरान बताया कि कई राज्यों ने अपनी रिपोर्ट दी है लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक मीटिंग में क्या रिजल्ट निकले उस बारे में नहीं बताया है।
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