नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मतदान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, जिससे अधिक से अधिक लोग मतदान केंद्र तक पहुंचें। अदालत ने संकेत दिया कि मतदान को अनिवार्य (Voting is mandatory) बनाने जैसे विकल्पों पर भी विमर्श किया जा सकता है, हालांकि यह व्यवस्था अत्यधिक कठोर नहीं होनी चाहिए।
यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें मांग की गई है कि यदि चुनाव मैदान में केवल एक उम्मीदवार ही बचता है, तब भी उसे निर्विरोध घोषित करने के बजाय मतदान कराया जाए, ताकि मतदाता “नोटा” (None of the Above) का विकल्प चुन सकें।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह जानने की कोशिश की कि NOTA लागू होने के बाद क्या मतदान प्रतिशत बढ़ा है और क्या उम्मीदवारों की गुणवत्ता में सुधार आया है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कभी-कभी यह महसूस होता है कि लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने हेतु कोई प्रभावी तंत्र होना चाहिए। उन्होंने ग्रामीण भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मतदान का दिन किसी उत्सव की तरह होता है—महिलाएं समूह में जाकर मतदान करती हैं और इसे सामाजिक भागीदारी का अवसर मानती हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि अपेक्षाकृत शिक्षित और संपन्न वर्ग में मतदान का प्रतिशत कई बार आर्थिक रूप से कमजोर तबकों से कम देखा गया है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) को चुनौती
यह सुनवाई विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा से जुड़ी याचिकाओं पर हो रही है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि NOTA को प्रभावी परिणाम से जोड़ा जाए, तो अधिक मतदाता मतदान के लिए प्रेरित होंगे। अभी NOTA चुनने का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं होता, जिससे मतदाता उदासीन रहते हैं। याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है, जो किसी एकमात्र उम्मीदवार के बचने पर उसे निर्विरोध निर्वाचित घोषित करने का प्रावधान देती है।
शब्बीर शाह मामले में NIA से अदालत के सवाल
एक अन्य मामले में अदालत ने कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से सवाल किए।
एजेंसी ने 1990 के दशक के कथित भड़काऊ भाषणों और ई-मेल को सबूत बताया, जिस पर पीठ ने टिप्पणी की कि ये सामग्री 30–35 वर्ष पुरानी है और नई नहीं है।
SIR सत्यापन में 10वीं के दस्तावेजों पर स्पष्टीकरण
अदालत ने पश्चिम बंगाल में चल रही SIR प्रक्रिया के तहत पहचान सत्यापन को लेकर भी स्पष्ट किया कि कक्षा 10 का प्रवेश पत्र अपने-आप में पूर्ण पहचान दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि इसे पूरक दस्तावेज के रूप में उपयोग किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि प्रवेश पत्र को जन्मतिथि या पारिवारिक पहचान से जुड़े प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
क्या है व्यापक संकेत?
सुनवाई के दौरान आई टिप्पणियों से यह संकेत मिला कि अदालत चुनावी भागीदारी बढ़ाने, NOTA को अधिक सार्थक बनाने और निर्विरोध चुनाव की व्यवस्था की समीक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा चाहती है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है, लेकिन यह बहस लोकतांत्रिक भागीदारी के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved