
नई दिल्ली। नितिन नबीन(Nitin Naveen) लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए, निर्विरोध भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (BJPNational President)बन गए हैं. वह कुछ समय पहले ही राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष(Construction Minister) बनाए गए थे. बिहार के एक मिनिस्टर को अचानक दिल्ली में बुलाकर भाजपा की कमान सौंपना करोड़ों लोगों के लिए चौंकाने वाली बात है. 45 साल के युवा अध्यक्ष, बिहार में पथ निर्माण मंत्री, भाजपा के छत्तीसगढ़ प्रभारी, पांच विधानसभा चुनाव लगातार जीते, 2008 से युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य… फिर भी लोगों के मन में एक सवाल है कि क्या सिर्फ जेन जी (युवाओं की नई पीढ़ी) को साधने के लिए इतना बड़ा फैसला लिया गया. इस फैसले के पीछे क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक (Rashtriya Swayamsevak Sangh)संघ है? असल में नतीन नबीन पिछले करीब दो दशक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र हैं. कम लोगों को पता होगा कि जब मोदी गुजरात(Modi Gujarat) के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब पटना का हाल उन्हें नितिन नबीन ही बताते थे. यूं कहिए बिहार में मोदी की आंख और कान थे नितिन नबीन.
2021 में प्रकाशित ‘बंधु बिहारी’ किताब में वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने 2005 से 2013 के दौरान बिहार में एनडीए सरकार के समय मोदी और नितिन नबीन की दोस्ती की चर्चा की है. भाजपा के कुछ नेता अंदर ही अंदर नाराज चल रहे थे. ठाकुर लिखते हैं कि कुछ नेता यह मानकर नाराज थे कि बिहार में एनडीए सरकार है लेकिन उन्हें नीतीश की ‘बी’ टीम बनाकर रख दिया गया है. इनमें से कुछ आवाजें बिहार के पार्टी नेताओं की थीं – जैसे भागलपुर के सांसद शाहनवाज हुसैन और राजीव प्रताप रूडी.
पंजाब में लुधियाना, जालंधर, संगरूर, पटियाला और बठिंडा के बस टर्मिनलों की बदलने वाली है सूरत, मान सरकार PPP मॉडल से करने जा रही अपग्रेड
हंसते चेहरे राज गहरे! जानें कैसे खुश दिखने की थकान बन रही है नई मेंटल स्ट्रगल, फेक स्माइल से घुट रहे हैं लोग
‘मैं निराश हूं, राष्ट्रगान को नहीं दिया गया उचित सम्मान…’ तमिलनाडु के राज्यपाल ने फिर विधानसभा से किया वॉकआउट
सवाल उठने लगे कि पार्टी बिहार गठबंधन का हिस्सा बने रहना चाहती है या नहीं? सुशील मोदी ने स्पष्ट किया कि किस व्यवस्था एवं समझौते के तहत सरकार को चलाया जा रहा है और उन्होंने अपने सहयोगियों से यहां तक कह दिया कि वह उन शर्तों के बारे में उनके विचार जानना चाहेंगे, वे शर्तें उन्हें उचित लगती हैं या नहीं. उनके आलोचक चुप हो गए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे खुश थे. वे नीतीश के नियंत्रण में रहने के बजाय नीतीश को नियंत्रण में रखना चाहते थे. वे बिहार के फैसले, उसके राजनीतिक व्याख्यान में अहम भूमिका चाहते थे. नीतीश उनसे परामर्श करने की भी परवाह नहीं करते थे, सरकार और शासन संबंधी मसलों पर उनकी बात सुनना तो दूर की बात थी. वह बिहार में सुशील मोदी और दिल्ली में अरुण जेटली के साथ विचार-विमर्श करके काम चलाने में ही खुश थे.
‘नीतीश ने गठबंधन का अपहरण किया’
उस दौरान बीजेपी के एक सांसद ने अकेले में शिकायत के लहजे में वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर से कहा कि बिहार में एक सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा होने का अर्थ ही क्या रह गया है. जब मैं एक मामूली नौकरी के लिए किसी की सिफारिश नहीं कर सकता, एक छोटा-मोटा ठेका किसी को नहीं दिला सकता, परेशान करनेवाले किसी अधिकारी का तबादला नहीं करा सकता, तो यह गठबंधन किस काम का? नीतीश ने इस गठबंधन का अपहरण कर लिया है और हमारे नेताओं ने नीतीश को ऐसा करने दिया है. इनके साथी पटना में भी थे, इतने ही चिढ़े हुए, लेकिन शिकायत करने का उनका अपना ही एक विशेष मजेदार लहजा था हम लोग इस सरकार के नपुं.. दूल्हा हैं.
नितिन नबीन तभी गुजरात जाते थे
दो विधायक नितिन नबीन, रामेश्वर चौरसिया और नीतीश सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह जैसे कुछ लोगों ने गुजरात सरकार के मेहमानों के रूप में गांधीनगर और अहमदाबाद में समय बिताना शुरू कर दिया था. नीतीश अच्छी तरह समझ रहे थे कि वे इतनी लंबी उड़ान क्यों भर रहे हैं और क्या संदेश लेकर लौट रहे हैं. नरेंद्र मोदी का खेल चल रहा था और नीतीश को इसके बारे में सोचना भी पसंद नहीं था लेकिन उन्होंने अपना संयम बनाए रखा, यह सोचकर कि जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री की ओर से सीधे तौर पर कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती, उन्हें परेशान होने की क्या आवश्यकता है लेकिन 10 मई, 2009 को स्थिति पलट गई.
लुधियाना रैली में नीतीश को बुलावा
एनडीए द्वारा एलके आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने का प्रयास जोरों पर था और इसी सिलसिले में लोकसभा के लिए प्रचार अभियान के दौरान 2009 में लुधियाना में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था. सभी घटक दलों के प्रमुख नेताओं और एनडीए मुख्यमंत्रियों को निमंत्रण-पत्र भेजे गए थे. तेलंगाना राष्ट्र समिति के के. चंद्रशेखर राव ने यूपीए से अलग होने के बाद उस सभा में भाग लेने का फैसला किया. इसके कारण एनडीए की समग्र मंडली में नया जोश भर गया था.
नीतीश को इस रैली में शामिल होने से हिचकिचाहट हो रही थी क्योंकि वह नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने के खिलाफ थे. उन्होंने जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव को जाने के लिए अनुरोध किया. रैली से दो दिन पहले जेटली ने नीतीश को फोन करके बताया कि आडवाणी की तीव्र इच्छा है कि आप जरूर आएं. नीतीश ने तत्काल कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया. बाद में जेटली ने संजय झा को इस काम पर लगा दिया और संजय झा अंततः नीतीश को मनाने में कामयाब हो गए. उन्होंने नीतीश को सुझाव दिया कि वे चार्टर्ड फ्लाइट से जाएंगे. रैली में हिस्सा लेंगे और उसी शाम वापस आ जाएंगे. बस, इतनी सी बात है. आडवाणीजी खुश हो जाएंगे. नीतीश और संजय झा विमान से चंडीगढ़ गए, वहां से उन्होंने सड़क के रास्ते रैली मैदान के लिए प्रस्थान किया.
मंच पर मोदी ने नीतीश का हाथ उठा दिया
अकाली मेजबानों ने लुधियाना रैली का आयोजन पंजाबी शैली में किया था. यह एक बड़ा और बहुत शोर-शराबे वाला कार्यक्रम था- ढोल बज रहे थे, तलवारें चमक रही थीं, भांगड़ा नर्तक पूरा जोश दिखा रहे थे. नीतीश ने तेजी से चलकर, भीड़ भरे मंच पर मुश्किल से कदम रखा ही था कि नरेंद्र मोदी दूसरी ओर से फुर्ती से आए, उनका हाथ पकड़ा और ऊपर उठा दिया ताकि सब देख सकें. भीड़ में खुशी की लहर दौड़ गई, तालियों की गड़गड़ाहट का शोर नीतीश को ऐसा लगा होगा जैसे कोई मक्खी कान में घुसकर फड़फड़ा रही हो. कैमरे निकल आए, तस्वीरें खिंची और नीतीश को माहौल अवश्य ही ऐसा महसूस हुआ होगा जैसे उन पर निशाना साधा जा रहा है.
सबकुछ क्षण भर में हो गया. इससे पहले कि नीतीश अपना होश संभाल पाते, मोदी ने उन्हें छोड़ दिया और मंच पर अपने निश्चित स्थान पर जाकर बैठ गए. रैली के बाद नीतीश जब संजय झा के साथ वापस कार में जाकर बैठे, उन्होंने संजय झा को लताड़ लगाना शुरू कर दिया. उनका गुस्सा फूट पड़ रहा था. उन्होंने कहा, ‘इसीलिए यहां लाए थे? आप जानते थे क्या होने वाला है, प्रोवोक किया गया है मुझे और आपने मुझे फंसाया.’ संजय झा ने नीतीश को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन नीतीश कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने कहा कि सब डेलिबरेट है, डिजाइन है, कल अखबार में वही फोटो छपेगा, जो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर जबरदस्ती खिंचवाया. इस तरह की राजनीति के मैं सख्त खिलाफ हूं. fallback
पटना पहुंचने तक दोनों के बीच फिर कोई बात नहीं हुई. अगली सुबह, जब संजय झा ने सभी अखबारों में छपी उस तस्वीर को देखा, तब उन्हें महसूस हुआ कि नीतीश को जाल में फंसाने के लिए उनका इस्तेमाल किया गया है. उस तस्वीर में नीतीश हाथ लहराते हुए दिख रहे थे.
मोदी के होर्डिंग कैंपेन के अगुआ थे नितिन नबीन
जून 2010 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पटना में होने वाली बैठक से कुछ ही दिन पहले, शहर की दीवारों पर पोस्टर लगने शुरू हो गए. इसमें नरेंद्र मोदी के प्रति आभार प्रकट किया गया था क्योंकि मोदी ने कोसी बाढ़ पीडितों की राहत के लिए 5 करोड़ रुपए का महादान देने का ऐलान किया था. सत्र की पूर्व संध्या पर, पटना के महत्वपूर्ण चौराहों पर बिहार की जनता की ओर से मोदी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु बड़े-बड़े विज्ञापन-पट्ट खड़े कर दिए गए. इनमें से अनेक होर्डिंग स्थानीय बीजेपी यूनिट से संबद्ध नितिन नबीन और रामेश्वर चौरसिया जैसे छोटे नेताओं द्वारा प्रायोजित थे. बहुत वर्षों में मोदी पहली बार पटना आ रहे थे. मोदी ने गुजरात में लगातार चुनाव जीते थे और पार्टी के सभी लोग उनके अभिनंदन का आयोजन कर रहे थे. उत्साह का समंदर उमड़ रहा था.
बीजेपी का सत्र आरंभ होने के समय नीतीश पटना में नहीं थे, वह अपनी विकास यात्रा के लंबे चरण पर उत्तर बिहार गए हुए थे. विधानसभा चुनाव कुछ ही माह के अंदर होने थे और उसके लिए जमीन तैयार करनी थी. नीतीश ने सुशील मोदी को आश्वासन दिया था कि वह वापस आने पर बीजेपी नेताओं को पटना से जाने से पहले डिनर पर आमंत्रित करेंगे. सुशील मोदी ने डिनर के आयोजन हेतु चाणक्य होटल का सुझाव दिया था, जहां बीजेपी के अनेक नेता ठहरे हुए थे. नीतीश ने सुझाव नहीं माना और कहा कि वह उन्हें घर पर भोजन कराएंगे. होटल में अपनेपन के साथ चर्चा नहीं हो पाती है.
अखबार में मोदी की तस्वीर देख भड़के नीतीश
एक अणे मार्ग के हरे-भरे मैदान पर एक शामियाना लगवाया गया था. किचन के लिए पीछे की जगह दी गई थी और ठेठ बिहारी पकवानों की एक सूची-बालूशाही, बेलग्रामी, खाजा, मालपुआ और बेशक, लिट्टी तथा चोखा भी…. जब अगले दिन अखबार नीतीश के सामने आए तो उनकी नजर जिस पर पड़ी उसके कारण उन्हें इतना गुस्सा आया कि वह हाथ में चाय का प्याला सीधा नहीं पकड़ सके. पटना के दो बड़े अखबारों में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन छापकर बाढ़ राहत कोष में 5 करोड़ रुपये की राशि दान करने के लिए नरेंद्र मोदी को धन्यवाद ज्ञापित किया गया था.
‘बिहार के मित्र’ के नाम पर खेला
विज्ञापन देने वालों का नाम नहीं छपा था. नाम के स्थान पर ‘बिहार के मित्र’ अंकित था. विज्ञापन जारी करने वाली एजेंसी का नाम एक्सप्रेशन ऐड्स था जो पटना में थी और जिसके मालिक अरिंदम गुहा थे. वह जनसंपर्क का काम करते थे और मीडिया एवं सरकारी महकमों में वह एक सुपरिचित नाम थे. कोई भी उस विज्ञापन देनेवाले का चेहरा छिपा नहीं सकता था. उस पर शब्दों में जो कुछ छपा था अप्रासंगिक था-नीतीश के दिल को सबसे ज्यादा चोट उस तस्वीर को देखकर पहुंची जिसमें नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार को एक-दूसरे की हथेली जकड़े ऊपर उठाए दिखाया गया था….
नीतीश ने गुस्से में संजय झा को बुलवाया और कहा कि अब डिनर नहीं होगा, निमंत्रण-पत्र वापस ले लो. संजय झा समझ गए कि यह बहस करने या कारण जानने का समय नहीं है. मुख्यमंत्री ने अपने घरेलू स्टाफ को आशियाना उखड़वाने और रसोई बंद कर देने का आदेश दे दिया. सुशील मोदी को पता लग गया कि नीतीश ने डिनर का कार्यक्रम रद्द कर दिया है…
नीतीश गुस्साए, मुझे बताए बगैर कैसे छपा
सुशील मोदी ने मध्यस्थों के जरिए नीतीश को मनाने का प्रयास किया, लेकिन प्रयास निष्फल रहा. गलत मेसेज चला जाएगा चुनाव से पहले, उन्होंने तर्क किया. उपमुख्यमंत्री को मालूम था कि कोई लाभ नहीं होगा. वह जानते थे कि उनका बॉस एक जिद्दी इंसान है, अब जबकि उन्होंने एक निश्चय कर लिया है तो उससे वह पीछे नहीं हटेंगे. नीतीश ने कहा, ‘गलत मेसेज चला गया है, आप लोगों ने भेजा है, मेरी जानकारी के बिना यह सब छपा कैसे?’
उसी दोपहर में नीतीश ने बीजेपी सत्र के लिए दिल्ली से आए पत्रकारों को आकस्मिक बातचीत के लिए चाणक्य होटल में लंच पर बुलाया. आते ही नीतीश ने बता दिया कि बीजेपी नेताओं को डिनर का निमंत्रण उन्होंने वापस ले लिया है और वह इस बात की जांच कराएंगे कि उक्त विज्ञापन प्रकाशित कैसे हुआ. सीरियस मामला है, इसकी तहकीकात होगी.
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved