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जो काम एक्सपर्ट्स के लिए कठिन, दलाल कह रहे आराम से करवा देंगे!

March 12, 2026

  • आयुष्मान योजना में एनएबीएच फाइनल लेवल की अनिवार्यता के बाद जबलपुर में सक्रिय हुए दलाल और फर्जी कम्पिनयां
  • अस्पताल संचालक परेशान

जबलपुर। आयुष्मान भारत योजना के तहत संबद्ध निजी अस्पतालों के लिए एनएबीएच फाइनल लेवल सर्टिफिकेट को अनिवार्य किए जाने के फैसले ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है। इस नियम के लागू होते ही जबलपुर सहित प्रदेश के बड़े शहरों में निजी कंपनियों और बिचौलियों का एक बड़ा जाल सक्रिय हो गया है। ये एजेंट अस्पताल संचालकों को झांसा देकर उनसे लाखों रुपए ऐंठने की कोशिश कर रहे हैं। हॉस्पिटल संचालकों व संगठनों द्वारा इस मामले में कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है। इस नियम की आड़ में दलाल अस्पतालों को सर्टिफिकेट दिलाने के नाम पर ठग रहे हैं। वर्तमान में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे महानगरों के अस्पतालों पर इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल रहा है। प्रशासन द्वारा अचानक लिए गए इस फैसले के बाद अस्पतालों के सामने अपनी संबद्धता बचाने का संकट खड़ा हो गया है जिसका सीधा फायदा दलाल उठाने की फिराक में हैं।


  • ढाई लाख तक के पैकेज का खेल
    नर्सिंग होम एसोसिएशन की हालिया बैठक में यह बात निकलकर आई है कि बाजार में ऐसी कई एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं जो खुद को एनएबीएच सलाहकार बता रही हैं। ये एजेंट सीधे अस्पताल के प्रबंधकों और मालिकों से संपर्क कर रहे हैं। उनके द्वारा आवेदन करने से लेकर कागजी खानापूर्ति और अंतिम सर्टिफिकेट दिलाने तक की पूरी जिम्मेदारी लेने का दावा किया जा रहा है। इसके बदले में अस्पताल संचालकों से 2 लाख से 2.5 लाख रुपए तक की मांग की जा रही है। एसोसिएशन का कहना है कि यह पूरी तरह से एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा है जो अस्पताल संचालकों की मजबूरी का फायदा उठा रहा है। कई अस्पतालों को इस बात का डर दिखाया जा रहा है कि यदि उन्होंने जल्द ही फाइनल लेवल सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं किया तो उन्हें आयुष्मान योजना के पैनल से बाहर कर दिया जाएगा। इसी घबराहट में कई संचालक इन बिचौलियों के जाल में फंस रहे हैं। जबलपुर में पहले इन दलालों की संख्या कम थी पर अब ये कई गुना बढ़ गयी है।

    फायर और इलेक्ट्रिक ऑडिट के नाम पर भी धोखा
    दलालों की सक्रियता केवल एनएबीएच सर्टिफिकेट तक ही सीमित नहीं है बल्कि अस्पताल संचालन के लिए जरूरी अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं में भी घुसपैठ हो चुकी है। जबलपुर शहर में अस्पतालों के इलेक्ट्रिक ऑडिट और फायर ऑडिट को पूरा कराने के नाम पर भी कई दलाल घूम रहे हैं। ताजा मामला शहर के एक बेहद प्रतिष्ठित अस्पताल संचालक के साथ सामने आया है जहां एक शातिर दलाल ने ऑडिट क्लियर कराने का झांसा देकर संचालक को 2 लाख रुपए का चूना लगा दिया है। दलाल ने दावा किया था कि वह बिना किसी तकनीकी अड़चन के सरकारी विभागों से ऑडिट रिपोर्ट और एनओसी जारी करवा देगा। पैसा लेने के बाद वह व्यक्ति गायब हो गया और अस्पताल का काम भी अधूरा रह गया। इस घटना के बाद शहर के अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी सतर्कता बढ़ गई है। एसोसिएशन ने आगाह किया है कि अस्पताल संचालक किसी भी बाहरी व्यक्ति को नकद भुगतान न करें और केवल आधिकारिक माध्यमों का ही उपयोग करें।

    अस्पतालों के बाहर होने का बढ़ा खतरा
    सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी चिंताजनक दिखाई देती है। मध्यप्रदेश के 4 बड़े शहरों में वर्तमान में 395 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना के अंतर्गत अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें से मात्र 59 अस्पताल ही ऐसे हैं जिनके पास एनएबीएच का फुल या फाइनल लेवल सर्टिफिकेट उपलब्ध है। बाकी के 212 अस्पताल पिछले 5 वर्षों से केवल एंट्री लेवल सर्टिफिकेट के भरोसे ही संचालित हो रहे हैं। नई अनिवार्यता के कारण अब करीब 336 अस्पतालों के आयुष्मान योजना से बाहर होने की संभावना बन गई है। जबलपुर में भी बड़ी संख्या में ऐसे अस्पताल हैं जो इस मानक को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। जबलपुर में इस श्रेणी के बमुश्किल 6 हॉस्पिटल ही हैं। हालांकि आयुष्मान कार्यालय ने स्थिति को समझते हुए 15 दिन का अतिरिक्त समय प्रदान किया है। अब 31 मार्च की जगह 15 अप्रैल तक का समय दिया गया है लेकिन अस्पताल संचालकों का कहना है कि इतने बड़े स्तर की कागजी कार्यवाही और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए यह समय बहुत कम है।

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