
प्रधानमंत्री (PM) 18-18 घंटे काम करते हैं… उनके अपने उनके काम पर नाज करते हैें… लेकिन नाज करने वालों के कामकाज इतने सवाल खड़े करते हैं कि ट्रिपल इंजन ( triple-engine) की सरकार (government) जंग लगी नजर आती है… हद तो तब हो जाती है जब उंगली कमाई पर नहीं खर्च ना करने पर उठाई जाती है… संसदीय समिति की हाल ही में संसद में पेश रिपोर्ट ने वो सच उगला कि पूरा देश हैरान हो गया… प्रधानमंत्री की 6 योजनाओं के लिए आवंटित अरबों रुपया सरकार खर्च ही नहीं कर पाई… यानी सरकार ने योजना तो बनाई, लेकिन 18 घंटे काम करने वाली सरकार पैसा होने पर भी लोगों को लाभ न दे पाई… मोदीजी ने सत्ता में आते ही स्वच्छ भारत अभियान चलाया… हर साल की तरह गत साल भी 58 हजार करोड़ आवंटित किए… लेकिन अभियान के तहत मात्र 22 हजार करोड़ खर्च हो पाए… यानी राज्य सरकारें और उनका शहरी और ग्रामीण प्रशासन खुले में शौच को रोकने… घर-घर में टायलेट बनाने जैसे कामों को अंजाम नहीं दे पाया… वहीं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए सौ शहरों का चयन किया गया.. इन शहरों को 100 से 500 करोड़ देना थे और उसके लिए 9700 करोड़ का बजट रखा गया.. लेकिन खर्च मात्र 1182 करोड़ का हुआ… इसी तरह अटल मिशन मिशन योजना के लिए 8400 करोड़ में से 2 हजार करोड़ ही खर्च हुए… वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए संरक्षित 9700 करोड़ में से भी 2 हजार करोड़ भी खर्च नहीं हुए… यानी कागजों पर योजना बनी… खजाने में पैसा संरक्षित रहा… अधिकारी सोते रहे… राज्य सरकारें मूर्छित रही और नेता योजनाओं का राग अलापते रहे… ना स्वच्छता अभियान गांव-गांव पहुंचा… ना खुले में शौच बंद हुआ.. ना स्मार्ट सिटी गति पकड़ पाई और ना पेयजल का लाभ लोगों को मिला… कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के 18 घंटे का काम उनके ही लोगों ने तबाह कर डाला… दिल्ली से शुरू हुई सफलता राज्यों तक आकर विफल हो गई… इन योजनाओं के लिए पैसा जुटाने में लगी सरकार ने टैक्स बढ़ाए… खजाना भरा और पैसा खर्च ही नहीं हुआ… दरअसल उसका बड़ा कारण यह रहा कि इन योजनाओं की नीतियों में ही गड़बड़ रही… केन्द्र सरकार ने राशि आवंटन में ही शर्त लगा दी कि जितना पैसा केन्द्र सरकार देगी उतना पैसा राज्य सरकारें खर्च करेगी… अब कई राज्यों के पास इन योजनाओं के लिए पैसा ही नहीं था… लिहाजा ना उन्होंने लिया और ना दिया… और केन्द्र में बैठी सरकार ने ढोल पीट लिया …
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