
नई दिल्ली। रसायन विज्ञान(chemistry) के क्षेत्र में 2026 का नोबेल पुरस्कार(Nobel Prize) ऐसी वैज्ञानिक खोज के लिए दिया गया है जिसने एक बेहद पेचीदा सवाल को समझने की नई राह दिखाई है। सवाल यह है कि देखने में लगभग एक जैसे लगने वाले कुछ मॉलिक्यूल्स आखिर एक दूसरे से इतने अलग कैसे हो सकते हैं और शुरुआत में मौजूद बेहद छोटा अंतर समय के साथ इतना बड़ा कैसे बन सकता है। हेनरी बी कागान और केन्सो सोआई के काम ने इसी गुत्थी को समझने में अहम भूमिका निभाई है। उनके शोध का संबंध(Asymmetric organic) असिमेट्रिक ऑर्गेनिक सिंथेसिस में नॉन लीनियर इफेक्ट्स और ऑटोकैटेलिसिस से है।
इस खोज को समझने के लिए सबसे आसान उदाहरण हमारे बाएं और दाएं हाथ का है। दोनों हाथ देखने में लगभग एक जैसे होते हैं लेकिन एक को दूसरे के ऊपर रखने पर वे पूरी तरह मेल नहीं खाते। रसायन विज्ञान में भी कुछ मॉलिक्यूल्स इसी तरह व्यवहार करते हैं। इन्हें काइरल मॉलिक्यूल कहा जाता है और इनके दो मिरर इमेज रूपों को एनैंटियोमर्स कहा जाता है। दोनों रूपों की बनावट एक दूसरे की आईने में दिखाई देने वाली तस्वीर जैसी होती है लेकिन उनका व्यवहार अलग हो सकता है।
इस अंतर का महत्व दवाओं के निर्माण में बेहद ज्यादा है। शरीर इन दोनों रूपों को अलग अलग तरीके से पहचान सकता है। किसी दवा में एक मिरर इमेज शरीर के लिए जरूरी प्रभाव पैदा कर सकती है जबकि दूसरा रूप कम असरदार या कुछ परिस्थितियों में नुकसानदायक भी हो सकता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करना चाहते हैं जिससे जरूरत वाले मॉलिक्यूल का सही रूप अधिक मात्रा में तैयार किया जा सके। थैलिडोमाइड का मामला इस विषय की गंभीरता को सामने ला चुका है।
यह रहस्य केवल दवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन की रसायन विज्ञान से भी जुड़ा है। जीवित दुनिया में कई मॉलिक्यूल्स के दो मिरर इमेज रूप संभव होते हैं लेकिन जीवन में अक्सर इनमें से केवल एक रूप का इस्तेमाल होता है। इसे होमोकाइरैलिटी कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर प्रोटीन बनाने वाले अमीनो एसिड्स के दो संभावित रूप हो सकते हैं लेकिन जीवित शरीर प्रोटीन निर्माण के लिए इनमें से केवल एक रूप का इस्तेमाल करता है। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसा क्यों हुआ।
इस कहानी में लुई पाश्चर का काम भी महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने टार्टरिक एसिड के अध्ययन के दौरान ऐसे क्रिस्टल देखे जो दो अलग रूपों में मौजूद थे और एक दूसरे की मिरर इमेज थे। बाद में उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया टार्टरिक एसिड के एक रूप को इस्तेमाल करते हैं लेकिन उसके मिरर इमेज रूप को नहीं। इससे यह संकेत मिला कि जीवित चीजें मॉलिक्यूल्स के इन दोनों रूपों में अंतर कर सकती हैं।
इसके बाद विली मार्कवाल्ड ने ऐसी रासायनिक प्रक्रिया की दिशा में काम किया जिसमें दोनों मिरर इमेज बराबर मात्रा में बनने के बजाय एक रूप अधिक बन सकता था। 1953 में चार्ल्स फ्रैंक ने यह समझाने के लिए एक मॉडल दिया कि अगर किसी प्रतिक्रिया में एक मिरर इमेज को शुरुआत में थोड़ी सी बढ़त मिल जाए और वही प्रक्रिया उस बढ़त को आगे बढ़ाती रहे तो छोटा अंतर लगातार बड़ा हो सकता है। इसे ऑटोकैटेलिसिस के विचार से समझा जा सकता है।
यहीं हेनरी कागान और केन्सो सोआई का काम खास बनता है। कागान ने दिखाया कि कैटेलिस्ट में बहुत छोटा बदलाव अंतिम उत्पाद में दोनों मिरर इमेज की मात्रा के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। इसे नॉन लीनियर इफेक्ट कहा गया। इसके बाद सोआई ने ऐसी प्रक्रिया पर काम किया जिसमें प्रतिक्रिया से बनने वाला पदार्थ खुद उसी प्रतिक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करता है।
इसका प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है इसे 1995 और 2003 के प्रयोगों से समझा जा सकता है। एक प्रक्रिया में शुरुआत में केवल 2 प्रतिशत की बढ़त मिली लेकिन आगे चलकर वही रूप 87 प्रतिशत तक पहुंच गया। बाद में ऐसी प्रक्रिया भी दिखाई गई जिसमें बेहद छोटी शुरुआती बढ़त लगातार बढ़ती गई और एक मिरर इमेज 99.99 प्रतिशत तक प्रमुख रूप बन सकती थी। यानी शुरुआत का मामूली अंतर रासायनिक प्रक्रिया के दौरान असाधारण रूप से बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है।
इस खोज ने जीवन की शुरुआत का रहस्य सीधे साबित नहीं किया है लेकिन इससे यह समझने का नया तरीका जरूर मिला है कि अगर शुरुआत में दोनों मिरर इमेज मौजूद हों तो उनमें से कोई एक रूप धीरे धीरे कैसे हावी हो सकता है। इसके अलावा ऐसी केमिस्ट्री दवाओं के साथ फ्लेवर खुशबू और खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों के निर्माण में भी उपयोगी हो सकती है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved