
उज्जैन। महाष्टमी के अवसर पर आज सुबह गुदरी स्थित 24 खंबा माता मंदिर से 27 किमी लंबी नगर पूजा यात्रा शुरु हुई। इस दौरान कलेक्टर ने यहां देवी महालया और महामाया का पूजन कर उन्हें मदिरा की धार चढ़ाई और भोग अर्पित किए। यात्रा विभिन्न भैरव और देवी मंदिरों में पहुंचेगी। शाम को इसका समापन होगा। दोपहर में हरसिद्धि देवी मंदिर में भी प्रशासन की ओर से पूजा की गई।
आज सुबह शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर नगर की शांति व सुख समृद्धि की कामना के लिए जिला प्रशासन द्वारा वर्षों पुरानी परंपरा को निभाते हुए नगर पूजा की शुरुआत की गई। नगर पूजा में सर्वप्रथम 24 खंबा मंदिर में विराजमान देवी महालया और महामाया का कलेक्टर रोशन कुमार सिंह और एसपी प्रदीप शर्मा ने विधिपूर्वक पूजन अर्चन किया। इस दौरान उन्होंने माता को बड़बाकल के रूप में भजिए, पूड़ी व भीगे चने के प्रसाद के साथ चुनरी, सुहाग सामग्री अर्पित की फिर मदिरा की धार का भोग अर्पित कर पूजा की शुरुआत की। ऐसी मान्यता है कि नगर पूजा से नगर के सभी रक्षक देवी देवता प्रसन्न होते हैं और अतृप्तों को तृप्ति मिलती है। जिससे वे प्रसन्न होकर नगर की शांति एवं सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इसी मान्यता व परंपरा के पालन में कलेक्टर द्वारा सोमवार को महा अष्टमी के अवसर पर सुबह चौबीस खंबा स्थित देवी महालया और महामाया की पूजा अर्चना के बाद कलेक्टर और एसपी कुछ दूर मदिरा से भरी हांडी लेकर चले। इसके बाद शासकीय अधिकारियों, कर्मचारियों व कोटवारों का दल नगर पूजा के लिए रवाना हुआ। इस दल में सबसे आगे ढोल और धर्म ध्वजा नजर आ रही थी। इसके पीछे तांबे के पात्र में मदिरा लिए कोटवार और बांस के टोकरों में बड़बाकल के रूप में भजिए, पूड़ी व भीगे चने आदि की प्रसाद व सुहाग सामग्री लिए कर्मचारी शामिल थे। दल द्वारा प्राचीन नगर की 27 किमी लंबी परिक्रमा में स्थित 40 से अधिक देवी और भैरव मंदिर में पूजा अर्चना कर बड़बाकाल का भोग अर्पित किया जाएगा। इसके साथ ही तांबे के पात्र में भरी मदिरा की सतत धार से पूरे मार्ग पर मदिरा अर्पित कर नगर पूजन का यह क्रम देर शाम तक चलेगा। नगर पूजा का समापन रात लगभग 9 बजे अंकपात स्थित हांडी फोड़ भैरव में पूजा अर्चना के साथ होगा। पौराणिक मान्यता है कि शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर नगर पूजा की परंपरा सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अपने राज्य व नगर में खुशहाली व सुख समृद्धि के लिए महाअष्टमी पर नगर पूजा की शुरूआत की थी। सम्राट विक्रमादित्य के काल से लेकर अब तक यह परंपरा चली आ रही है। वर्तमान में नगर पूजा में होने वाले खर्च का वहन जिला प्रशासन द्वारा किया जाता है।
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