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युगांडा में चिंपैंजियों का ‘गृहयुद्ध’, एक ही समूह के साथी बने दुश्मन; 28 से ज्यादा की मौत

April 12, 2026

नई दिल्ली। हॉलीवुड फिल्म ‘प्लेनेट ऑफ द ऐप्स’ (Planet of the Apes) की कहानी अब हकीकत जैसी लगने लगी है। युगांडा (Uganda) के किबाले राष्ट्रीय उद्यान में चिंपैंजियों (chimpanzees) के एक बड़े समूह के बीच ऐसा विभाजन हुआ कि अब यह खूनी संघर्ष में बदल चुका है। बीते कुछ वर्षों में 28 से अधिक चिंपैंजी मारे जा चुके हैं, जबकि कई अब भी लापता हैं।



  • 200 के समूह का टूटना बना संघर्ष की जड़
    वैज्ञानिकों के अनुसार, यह समूह कभी 200 से ज्यादा चिंपैंजियों का था, जो साथ रहते, भोजन साझा करते और एक-दूसरे की देखभाल करते थे। लेकिन 2018 के बाद हालात बदलने लगे और समूह छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गया। धीरे-धीरे आपसी मतभेद हिंसा में बदल गए।

    घात लगाकर हो रहे हमले, ‘पश्चिमी’ समूह हावी
    रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने इन समूहों को अलग-अलग नाम दिए हैं। ‘पश्चिमी’ समूह ज्यादा आक्रामक माना जा रहा है, जो योजनाबद्ध तरीके से ‘मध्य’ समूह पर हमला करता है। चिंपैंजी कतार बनाकर सीमाओं तक पहुंचते हैं और जैसे ही विरोधी समूह का कोई सदस्य मिलता है, उस पर सामूहिक हमला कर देते हैं।
    इसका नतीजा यह है कि मध्य समूह की संख्या लगातार घट रही है, जबकि पश्चिमी समूह का इलाका बढ़ता जा रहा है।

    2019 की घटना बनी टर्निंग पॉइंट
    वैज्ञानिकों का मानना है कि 2019 में ‘बेसी’ नामक एक चिंपैंजी की हत्या इस संघर्ष का निर्णायक मोड़ बनी। उसी समूह के अन्य चिंपैंजियों ने उस पर हमला कर उसे मार डाला। यह घटना सामाजिक ताने-बाने के टूटने का संकेत थी।

    दिलचस्प बात यह रही कि मरते समय एक करीबी साथी चिंपैंजी उसके साथ बना रहा और उसे सहारा देने की कोशिश करता रहा—जो इस जटिल सामाजिक व्यवहार को दर्शाता है।

    बीमारियों और नेतृत्व बदलाव ने बढ़ाया तनाव
    2014 और 2017 में फैली बीमारियों ने भी समूह को कमजोर किया, जिसमें कई चिंपैंजी मारे गए। इसके साथ ही, पुराने और अनुभवी चिंपैंजियों की मौत से समूह की स्थिरता खत्म होने लगी।
    इसी दौरान एक नए नर चिंपैंजी के नेतृत्व में आने से तनाव और बढ़ गया।

    सामाजिक दूरी से शुरू हुआ टकराव
    वैज्ञानिकों ने पाया कि हिंसा से पहले ही चिंपैंजियों के व्यवहार में बदलाव दिखने लगा था। वे पहले की तरह साथ समय नहीं बिताते थे, न ही एक-दूसरे को संवारते या साथ भोजन करते थे।

    धीरे-धीरे यह दूरी स्थायी अलगाव में बदल गई और अंततः पूर्व साथी एक-दूसरे के दुश्मन बन गए।

    वैज्ञानिकों के लिए भी है बड़ा सवाल
    यह घटनाक्रम न केवल वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सामाजिक संरचना टूटने पर जानवरों में भी इंसानों जैसी हिंसा और ‘गुटबाजी’ उभर सकती है।

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