
लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 (UP Elections 2027) को लेकर कांग्रेस (Congress) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच सीट बंटवारे पर बातचीत शुरू हो गई है। कांग्रेस ने उन करीब 200 विधानसभा (200 seats) क्षेत्रों की पहचान की है, जहां से वह चुनाव लड़ना चाहती है। हालांकि, पार्टी ने स्पष्ट किया है कि इन सीटों की सूची का मतलब गठबंधन में इतनी ही सीटें मांगना नहीं है। कांग्रेस के लिए सीटों की निश्चित संख्या से ज्यादा गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस की ओर से तैयार सूची को चार श्रेणियों में बांटा गया है। इन श्रेणियों के आधार पर पार्टी ने अलग-अलग सीटों पर समझौते की गुंजाइश तय की है। कुछ सीटों पर कांग्रेस अपने रुख पर कायम रहना चाहती है, जबकि अन्य सीटों पर बदलाव के लिए तैयार है। अब जब कांग्रेस अखिलेश यादव से 200 सीटें मांग रही है तो ऐसे में देश की सबसे पुरानी पार्टी का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड देखना तो बनता है।
गिरता गया कांग्रेस का ग्राफ- 38 साल का ट्रैक रिकॉर्ड
1985 के बाद कांग्रेस की गिरावट की कहानी केवल सीटें घटने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसके वर्चस्व के खत्म होने की भी कहानी है। 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 94 सीटों पर सिमट गई और जनता दल 208 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसके बाद 1991 में कांग्रेस को 46 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने 221 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। 1993 में कांग्रेस की सीटें घटकर 28 रह गईं। 1996 में पार्टी ने 33 सीटें जीतीं, लेकिन सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी।
इसके बाद भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल नहीं कर पाई। 2002 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 25 सीटें मिलीं, जबकि 2007 में वह 22 सीटों पर सिमट गई। 2012 में कांग्रेस ने कुछ सुधार करते हुए 28 सीटें जीतीं, लेकिन समाजवादी पार्टी की 224 सीटों के मुकाबले उसका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया, फिर भी उसे केवल सात सीटें मिलीं। कांग्रेस को गठबंधन के तहत सपा ने 105 सीटें दी थीं। जबकि सपा 298 सीटों पर लड़ी थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और खराब रहा और वह 403 सदस्यीय विधानसभा में महज दो सीटें जीत सकी। इस बार कांग्रेस अकेले लड़ी थी। यानी पिछले दो यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस डबल डिजिट भी क्रॉस नहीं कर पाई।
कुल मिलाकर, 1985 में 269 सीटें जीतकर सरकार बनाने वाली कांग्रेस 2022 में महज दो सीटों तक पहुंच गई। 1989 के बाद से पार्टी उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के जरिए सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। यानी पिछले 38 साल से कांग्रेस का यूपी में बुरा हाल है। 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करने का अवसर हो सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी अब अधिक मुखर होकर सीट बंटवारे में लगी हुई है।
प्रियंका गांधी की बैठकों के बाद शुरू हुई बातचीत
कांग्रेस और सपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत शुरुआती दौर में है। इससे पहले दोनों दलों के बीच प्रारंभिक चर्चा हुई थी। इसके बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में पार्टी की तीन आंतरिक बैठकें हुईं। सीट बंटवारे पर बातचीत शुरू होने के दौरान उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष आराधना मिश्रा, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष इमरान मसूद और राज्य प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी मौजूद थे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इन नेताओं ने चुनावी रणनीति और सीटों के बंटवारे से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।
चार श्रेणियों में बांटी गईं सीटें, जानिए क्या है रणनीति
ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस ने करीब 200 विधानसभा क्षेत्रों की सूची को चार श्रेणियों में बांटा है। इसका मकसद सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना और जरूरत के मुताबिक समझौते की गुंजाइश बनाए रखना है।
श्रेणी A: इन सीटों को लेकर कांग्रेस का रुख सबसे ज्यादा सख्त है। पार्टी इन पर अपने दावे से पीछे हटने के पक्ष में नहीं है।
श्रेणी B: इन सीटों पर कांग्रेस कुछ बदलावों पर विचार कर सकती है।
श्रेणी C और D: इन दोनों श्रेणियों में शामिल सीटों पर पार्टी समझौते और बदलाव के लिए अपेक्षाकृत अधिक तैयार है।
हालांकि, कांग्रेस ने इस सूची में शामिल सीटों की कोई निश्चित संख्या या श्रेणीवार ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है।
सीटों की संख्या से ज्यादा सम्मान पर जोर
कांग्रेस नेताओं ने साफ किया है कि करीब 200 सीटों की सूची को पार्टी की चुनावी प्राथमिकताओं के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि इतनी ही सीटें हासिल करने की मांग के रूप में। पार्टी ने अपने लिए सीटों की कोई न्यूनतम संख्या भी तय नहीं की है।
सीटों की बड़ी संख्या पर सवाल उठने के बाद कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी का लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है और वह ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं करेगी, जिससे उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हो। नेता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सम्मान के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा।
इस रुख से संकेत मिलता है कि कांग्रेस सीटों की संख्या के साथ-साथ गठबंधन में अपनी राजनीतिक हैसियत को भी अहम मान रही है। पार्टी चाहती है कि सीट बंटवारे में उसकी चुनावी प्राथमिकताओं और राजनीतिक महत्व को पर्याप्त जगह मिले।
2024 के लोकसभा चुनाव में साथ लड़े थे दोनों दल
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में सपा ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 37 पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को छह सीटों पर सफलता मिली थी। इस तरह दोनों दलों की संयुक्त सीटों की संख्या 43 रही थी।
इस प्रदर्शन ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन को मजबूत स्थिति में पहुंचाया था। अब दोनों दलों के सामने इस तालमेल को 2027 के विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखने की चुनौती है।
सपा-कांग्रेस के लिए सीट बंटवारा होगा बड़ी परीक्षा
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ सपा और कांग्रेस विपक्षी गठबंधन के प्रमुख साझेदार हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले सीटों का बंटवारा दोनों दलों के बीच तालमेल की अहम परीक्षा साबित हो सकता है।
कांग्रेस गठबंधन में अपनी प्रभावी भूमिका चाहती है, जबकि सीटों का अंतिम बंटवारा इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों दल एक-दूसरे की चुनावी प्राथमिकताओं के लिए कितनी गुंजाइश छोड़ते हैं। फिलहाल, कांग्रेस की चार श्रेणियों वाली सूची ने बातचीत के लिए शुरुआती आधार तैयार कर दिया है। अब यह देखना होगा कि दोनों दल अपने-अपने हितों को साधते हुए किस तरह सीटों पर सहमति बनाते हैं।
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