वाशिंगटन। मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच (United States) ने (Iran) के सैन्य ठिकानों पर अपने हमले और तेज कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी (United States Army)सेना अब खास तौर पर उन ठिकानों को निशाना बना रही है जो जमीन के काफी नीचे बनाए गए हैं और जहां मिसाइलों व हथियारों का भंडार रखा जाता है।
CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने हाल के हमलों में 2000 पाउंड वजनी दर्जनों बंकर-भेदी बम ईरान के सैन्य ठिकानों पर गिराए हैं।
Dan Caine, जो Joint Chiefs of Staff के अध्यक्ष हैं, ने Pentagon में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि हाल के दिनों में अमेरिकी बमवर्षक विमानों ने ईरान के कई भूमिगत मिसाइल लॉन्चर ठिकानों पर जीपीएस-नियंत्रित 2000 पाउंड वजनी बंकर-भेदी बमों से हमला किया है।
अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth और जनरल केन ने कहा कि ईरान की मिसाइल निर्माण और लॉन्च करने की क्षमता को खत्म करना फिलहाल अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य प्राथमिकता है। उनके अनुसार हमलों में ईरान के कई ड्रोन निर्माण कारखानों को भी निशाना बनाया गया है, ताकि उसकी ड्रोन क्षमता कमजोर की जा सके।
भूमिगत सैन्य ढांचे पर फोकस
अमेरिका अब केवल जमीन पर मौजूद सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ईरान के भूमिगत सैन्य औद्योगिक ढांचे को भी निशाना बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान ने वर्षों से अपने कई मिसाइल लॉन्चर, हथियार भंडार और कमांड सेंटर भूमिगत सुरंगों और बंकरों में बनाए हैं, जिससे उन्हें नष्ट करना बेहद कठिन हो जाता है।
परमाणु ठिकानों को लेकर चुनौती
हालांकि अमेरिकी सेना का दावा है कि हमलों से ईरान की मिसाइल क्षमता को नुकसान पहुंचा है, लेकिन एक बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है—ईरान के भूमिगत परमाणु ठिकाने। रिपोर्टों के अनुसार इन ठिकानों में बड़ी मात्रा में समृद्ध यूरेनियम मौजूद है, जिसे केवल हवाई हमलों से पूरी तरह नष्ट करना आसान नहीं माना जाता।
जमीनी कार्रवाई की भी चर्चा
सूत्रों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन इस विकल्प पर भी विचार कर रहा है कि यदि जरूरत पड़ी तो इन परमाणु भंडारों को कब्जे में लेने के लिए जमीनी सैन्य अभियान चलाया जा सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा अभियान बेहद जोखिम भरा होगा और इसके लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती करनी पड़ सकती है।
मध्य-पूर्व में लगातार बढ़ते हमलों और जवाबी कार्रवाई के बीच क्षेत्रीय तनाव चरम पर पहुंच गया है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
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