
नई दिल्ली ।हिंदी फिल्म (Film) संगीत के इतिहास में कई ऐसे गीत दर्ज हैं जिन्होंने समय की सीमाओं को पार करते हुए पीढ़ियों तक अपनी लोकप्रियता बनाए रखी। वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रोफेसर (Professor)’ का गीत ‘आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ’ भी ऐसे ही अमर गीतों में शामिल है। मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi) और लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) की आवाज में रिकॉर्ड किया गया यह गीत (Song) आज भी संगीत प्रेमियों के बीच उतना ही पसंद किया जाता है जितना अपने दौर में था। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गीत को लेकर अभिनेता शम्मी कपूर (Shammi Kapoor) शुरुआत में पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे।
फिल्म ‘प्रोफेसर’ के लिए संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने इस गीत की धुन तैयार की थी। गीत की रिकॉर्डिंग और प्रस्तुति को लेकर संगीत जगत के जानकारों ने इसकी सराहना की थी। बावजूद इसके, फिल्म के मुख्य अभिनेता शम्मी कपूर को गीत के फिल्मांकन और उसमें अपने किरदार की मौजूदगी को लेकर कुछ आपत्तियां थीं। उनका मानना था कि गीत के शुरुआती हिस्से में नायिका का प्रभाव अधिक दिखाई देता है और उन्हें अपेक्षित स्क्रीन स्पेस नहीं मिल रहा है।
बताया जाता है कि शम्मी कपूर इस बात को लेकर इतने गंभीर थे कि वे गीत में बदलाव चाहते थे। उनका मानना था कि फिल्म के नायक के रूप में उनकी उपस्थिति और प्रभाव गीत में अधिक प्रमुख होना चाहिए। यह मामला धीरे-धीरे चर्चा का विषय बनने लगा और फिल्म से जुड़े लोगों के बीच इस पर विचार-विमर्श भी हुआ।
इसी दौरान हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और फिल्मकार राज कपूर ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने शम्मी कपूर को समझाया कि गीत की मौजूदा संरचना उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इसमें किसी तरह का बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है। राज कपूर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि दर्शक इस गीत को पसंद करेंगे और इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा।
फिल्म के प्रदर्शन के बाद राज कपूर की बात सही साबित हुई। प्रीमियर शो के दौरान जब यह गीत बड़े पर्दे पर प्रदर्शित हुआ तो दर्शकों और फिल्म जगत के कई प्रमुख कलाकारों ने इसे बेहद पसंद किया। गीत के शुरुआती हिस्से में लता मंगेशकर की मधुर आवाज के बाद जैसे ही मोहम्मद रफी की पंक्तियां सुनाई दीं, सभागार में मौजूद कई नामचीन हस्तियां उत्साह से भर उठीं। तालियों की गूंज ने स्पष्ट कर दिया कि यह गीत असाधारण प्रभाव छोड़ने में सफल रहा है।
इस प्रतिक्रिया ने शम्मी कपूर को भी आश्चर्यचकित कर दिया। जिस गीत को लेकर उन्होंने संदेह व्यक्त किया था, वही गीत दर्शकों की पहली पसंद बन गया। समय के साथ यह गीत हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक युगल गीतों में गिना जाने लगा और आज भी रेडियो, संगीत कार्यक्रमों तथा डिजिटल मंचों पर सुना जाता है।
मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को अनेक यादगार गीत दिए। ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे’, ‘बदन पे सितारे’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, ‘बार-बार देखो’, ‘तुमने मुझे देखा होकर मेहरबान’ और ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’ जैसे गीतों ने दोनों की लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यही कारण है कि रफी की आवाज और शम्मी कपूर की स्क्रीन उपस्थिति को हिंदी फिल्म संगीत की सबसे सफल साझेदारियों में से एक माना जाता है। ‘आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ’ का यह प्रसंग आज भी इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कभी-कभी कलाकारों की आशंकाओं के बावजूद दर्शकों का फैसला किसी रचना को अमर बना देता है।
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