
जबलपुर। मध्य प्रदेश में बिजली की कीमतों में औसत 10.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी के प्रस्ताव ने तूल पकड़ लिया है। बिजली कंपनियों द्वारा मप्र विद्युत नियामक आयोग को भेजी गई याचिका पर अब विशेषज्ञों ने मोर्चा खोल दिया है। विशेषज्ञों का दावा है कि बिजली कंपनियों ने जनता पर बोझ डालने के लिए 6044 करोड़ रुपये का जो घाटा दिखाया है, उसके पीछे 9204 करोड़ रुपये के ऐसे मनमाने आंकड़े रखे गए हैं, जिनका कोई ठोस आधार नहीं है। विशेषज्ञों ने आयोग को भेजी अपनी आपत्ति में स्पष्ट किया है कि यदि इन आंकड़ों से जुड़े दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण किया जाए, तो कंपनियों का कथित घाटा मुनाफे में बदल सकता है। सबसे बड़ी आपत्ति पॉवर मैनेजमेंट कम्पनी के आंकड़ों को लेकर है। कहा गया कि कम्पनी अपने घाटे प्रमाणित नहीं कर पा रही पर हर्जाना मांग रही है।
बिजली चोरी और स्मार्ट मीटर के नाम पर वसूली की तैयारी
विशेषज्ञों के अनुसार, बिजली कंपनियां अपनी विफलताओं और तकनीकी कमियों का हर्जाना उपभोक्ताओं से वसूलना चाहती हैं। प्रदेश में बिजली चोरी के कारण होने वाले 696 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई जनता की जेब से करने की तैयारी की गई है। इसी तरह, स्मार्ट मीटर के नाम पर 197 करोड़ रुपये की मांग की गई है, जबकि हकीकत यह है कि वितरण कंपनियों ने अभी तक इस मद में राशि का भुगतान ही नहीं किया है। बिना भुगतान किए उपभोक्ताओं से यह राशि वसूलने के प्रस्ताव को विशेषज्ञों ने पूरी तरह गलत और नियम विरुद्ध करार दिया है।
ऑफलाइन जनसुनवाई पर ज्यादा जोर
मप्र विद्युत नियामक आयोग ने बिजली टैरिफ याचिका को लेकर 25 जनवरी तक आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं। इसके बाद जबलपुर, भोपाल और इंदौर में जनसुनवाई आयोजित की जाएगी। बिजली विशेषज्ञों ने आयोग से मांग की है कि इस बार जनसुनवाई केवल ऑनलाइन तक सीमित न रहे। पारदर्शिता के लिए फिजिकल जनसुनवाई आयोजित की जानी चाहिए, ताकि आपत्ति दर्ज कराने वाले लोग आयोग के सामने बैठकर दस्तावेजों के साथ अपनी बात रख सकें और कंपनियों द्वारा पेश किए गए आंकड़ों की पोल खोल सकें।
आयोग जांच करे तो खुलासे होंगे:अग्रवाल
विद्युत मामलों के विशेषज्ञ राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि बिजली कंपनियों को इन मनमाने आंकड़ों का जवाब देना चाहिए। जनता को ये जानने का अधिकार है। कंपनियां खारिज हो चुके दावों और काल्पनिक खर्चों के जरिए जनता पर बोझ डाल रही हैं। आयोग यदि दस्तावेजों का निष्पक्ष परीक्षण करे, तो घाटा मुनाफे में बदल जाएगा।
एक ही खर्च दो-दो जगह दर्ज
याचिका के तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी का मूल कार्य वितरण कंपनियों के लिए बिजली खरीदकर उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद कंपनी ने समानांतर रूप से बिजली खरीदी के लिए 438 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग की है। इतना ही नहीं, उपभोक्ताओं पर दो वर्ष के ब्याज के रूप में 774 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बोझ लादने का प्रस्ताव भी दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली कंपनियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब ताप गृहों से बिजली खरीदी का व्यय अलग से दिखाया गया है, तो अन्य मदों में ये करोड़ों रुपये क्यों मांगे जा रहे हैं।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved