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भगवान हमें पाप करने से खुद क्यों नहीं रोकते? प्रेमानंद महाराज ने बताया

January 11, 2026

डेस्क: आज के दौर में जब भी कोई व्यक्ति (Person) दुखों से घिरता है या समाज में बुराई देखता है, तो उसके मन में एक सवाल जरूर आता है, अगर भगवान (Loard) सब देख रहे हैं और हम उनके बच्चे (Children) हैं, तो वो हमें गलत काम करने से रोकते क्यों नहीं? अध्यात्म की अलख जगाने वाले प्रेमानंद महाराज (Premanand Maharaj) से हाल ही में एक भक्त ने यही सवाल पूछा. उन्होंने इसका जो जवाब दिया, वह न केवल तार्किक है बल्कि जीवन की दिशा बदल देने वाला है.

प्रेमानंद महाराज के पास पहुंचे एक भक्त ने अपनी दुविधा रखते हुए पूछा, महाराज जी, आप कहते हैं कि हम परमात्मा के अंश हैं और वे हमारे पिता हैं. फिर उन्होंने हमें गलत काम करने का बल क्यों दिया? जब वे जानते हैं कि हम गलत राह पर जा रहे हैं, तो वे हाथ पकड़कर हमें रोक क्यों नहीं लेते? उन्होंने कहा, मान लीजिए किसी ने आपको ₹100 दिए और बाजार भेज दिया. अब यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप उस पैसे से फल और मिठाई खरीदकर अपना पेट भरते हैं, या उसे जुए और शराब जैसे बुरे कामों में उड़ा देते हैं. देने वाले ने तो आपको केवल एक ‘साधन’ (पूंजी) दिया है, उसका इस्तेमाल कैसे करना है, यह आपका चुनाव है.”


  • प्रेमानंद महाराज समझाते हैं कि भगवान ने मनुष्य को हाथ, पैर, वाणी और सबसे बढ़कर ‘विवेक’ (सोचने-समझने की शक्ति) दी है. यह एक ईश्वरीय पूंजी है.

    • वाणी का चुनाव: आपको बोलने की शक्ति मिली है. अब यह आप पर है कि आप उस मुख से किसी को गाली देते हैं या ‘राधा-राधा’ और ‘राम-राम’ का जाप करते हैं.
    • इंद्रियों का सही उपयोग: भगवान ने आंखें दी हैं, तो आप उससे अश्लीलता देख सकते हैं या प्रभु के दर्शन. हाथ दिए हैं, तो आप किसी की मदद कर सकते हैं या किसी का अहित.

    प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मनुष्य जन्म हमें अपनी पुरानी गलतियों और बुरी आदतों को सुधारने के लिए मिला है. भगवान ने हमें कर्म की स्वतंत्रता’ दी है. अगर भगवान हमें रोबोट की तरह कंट्रोल करते, तो फिर पाप और पुण्य का कोई महत्व ही नहीं रह जाता. ईश्वर ने हमें बुद्धि दी है जो हर गलत काम करने से पहले हमें टोकती है. जिसे हम ‘अंतरात्मा की आवाज’ कहते हैं, वही भगवान का हमें रोकने का तरीका है. लेकिन अगर हम उस आवाज को अनसुना कर देते हैं, तो यह हमारी इच्छाशक्ति की कमी है. इसिलए यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उस ईश्वरीय शक्ति का उपयोग सत्कर्मों में करे. भगवान रास्ता दिखाते हैं, लेकिन उस रास्ते पर चलना या न चलना पूरी तरह मनुष्य के हाथ में है.

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