
नई दिल्ली। आधुनिक जीवनशैली (Modern Lifestyle) और तनाव भरी जिंदगी में बीपी, मधुमेह, जोड़ों का दर्द, सिरदर्द जैसी आम बीमारियों (Common illnesses) को बीमा दावा (Insurance claims) खारिज करने के लिए पहले से मौजूद बीमारी (प्री-एक्जिस्टिंग डिसीज) या ‘रोग छिपाना’ नहीं माना जा सकता। सेंट्रल जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (District Consumer Disputes Redressal Commission) ने बीमा दावे से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।
आयोग की अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार और सदस्य डॉ. रश्मि बंसल की पीठ ने एक वरिष्ठ नागरिक के मेडिकल बीमा दावे पर सुनवाई करते हुए कहा कि बीमा कंपनी को यह साबित करना होगा कि ग्राहक को पॉलिसी लेने से पहले बीमारी की जानकारी थी या उसने जानबूझकर इसे छिपाया।
क्या मामला?
इससे पहले रोहिणी निवासी 65 वर्षीय यशपाल बहल ने समूह चिकित्सा बीमा योजना के तहत 21 अक्तूबर 2019 से अपना और पत्नी का साढ़े सात लाख का बीमा कराया था, इसके लिए 17,895 रुपये सालाना प्रीमियम चुकाया। 2021 में 20 से 23 जुलाई तक इलाज पर 4,15,332 रुपये और 25-26 जुलाई को 55,673 रुपये खर्च हुए। उन्होंने बीमे का दावा किया, लेकिन कंपनी ने भुगतान करने से इनकार कर दिया। सात अगस्त 2021 को दावा खारिज करने के बाद कंपनी ने 12 नवंबर 2021 को पॉलिसी भी रद्द कर दी।
चार साल से बीपी होने का सबूत नहीं मिला
बीमा कंपनी का तर्क था कि यशपाल बहल को करीब चार साल से उच्च रक्तचाप की बीमारी थी, उन्होंने बीमा लेते समय इसकी जानकारी छिपाई थी। कंपनी ने अपने पक्ष में बहल के हस्ताक्षर वाला एक कथित बयान का हवाला दिया। हालांकि, उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने पाया कि बयान दर्ज करने वाले जांचकर्ता का शपथपत्र या गवाही पेश नहीं की गई। बीमारी चार साल पुरानी होने की पुष्टि के लिए कोई पुराना चिकित्सकीय पर्चा, जांच रिपोर्ट या नियमित इलाज का रिकॉर्ड भी अदालत में पेश नहीं किया गया।
ब्याज के साथ भुगतान
आयोग ने चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी को बुजुर्ग के बीमा दावों के 4.71 लाख रुपये छह प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया। आयोग ने पीड़ित की बीमा पॉलिसी रद्द करने की कार्रवाई को भी अनुचित ठहराया। कंपनी को उसे मानसिक परेशानी के 25 हजार और मुकदमा खर्च के रूप में 15 हजार रुपये अलग से देने होंगे।
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