नई दिल्ली। रूस की परमाणु क्षमता वाली क्रूज मिसाइल बुरेवेस्टनिक (9M730 Burevestnik) को लेकर एक बार फिर दुनिया की नजरें आर्कटिक क्षेत्र (Arctic region) पर टिक गई हैं। हालिया सैटेलाइट तस्वीरों (Arctic region) में रूस के नोवाया जेमल्या द्वीप समूह (Novaya Zemlya archipelago) पर सैन्य विमानों और टेस्टिंग से जुड़े उपकरणों की गतिविधियां दिखाई देने का दावा किया गया है। इससे आशंका जताई जा रही है कि रूस इस विवादित मिसाइल का नया फ्लाइट टेस्ट करने की तैयारी में है।
इस मिसाइल को पश्चिमी देशों में ‘Skyfall’ और मीडिया रिपोर्टों में ‘Flying Chernobyl’ जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह बताई जाती है कि यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाले प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल करती है, जिससे इसे बेहद लंबी दूरी तक उड़ाने की क्षमता मिल सकती है।
द सन की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में नोवाया जेमल्या क्षेत्र में रूसी सैन्य विमानों की गतिविधियां बढ़ी हैं। इसी इलाके में पहले भी बुरेवेस्टनिक के परीक्षण किए जा चुके हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस सप्ताह दो Il-976 SKIP विमान रोगाचेवो एयरबेस पर पहुंचे। इन विमानों का इस्तेमाल मिसाइल परीक्षण के दौरान उड़ान से जुड़े आंकड़े जुटाने और मिसाइल के रास्ते की निगरानी के लिए किया जाता है।
सैटेलाइट तस्वीरों में एयरबेस पर एक A-50U एयरबोर्न अर्ली-वॉर्निंग विमान, चार An-26 सैन्य परिवहन विमान, एक An-74 और कई हेलिकॉप्टर भी दिखाई देने का दावा किया गया है। टेस्टिंग से जुड़े कुछ नागरिक जहाजों के बैरेंट्स और कारा सागर में पैंकोवो टेस्ट रेंज के आसपास पहुंचने की भी जानकारी सामने आई है।
रूस लंबे समय से बुरेवेस्टनिक को अपनी ऐसी रणनीतिक मिसाइल के तौर पर पेश करता रहा है, जिसकी मारक क्षमता बेहद लंबी हो सकती है। इसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बताया जाता है।
रूस के शीर्ष सैन्य अधिकारी जनरल वालेरी गेरासिमोव ने 2025 में एक कथित सफल परीक्षण के बाद दावा किया था कि मिसाइल ने करीब 15 घंटे में 14,000 किलोमीटर की दूरी तय की। उनके अनुसार, परीक्षण के दौरान मिसाइल ने निर्धारित वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल मूवमेंट पूरे किए और उसकी एयर डिफेंस से बचने की क्षमता का प्रदर्शन किया।
हालांकि, इस हथियार के परीक्षण रिकॉर्ड को लेकर भी सवाल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अब तक इसके करीब 14 परीक्षण किए गए हैं, जिनमें केवल दो को सफल माना गया है—एक 2022 और दूसरा 2025 में।
बुरेवेस्टनिक को ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ कहे जाने की वजह इसका परमाणु ऊर्जा आधारित इंजन है। विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि परीक्षण के दौरान इस सिस्टम में गंभीर खराबी आती है, तो रेडियोधर्मी सामग्री के फैलने का खतरा पैदा हो सकता है।
इसका संबंध 1986 की चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना से जोड़ा जाता है, जिसे इतिहास की सबसे गंभीर परमाणु दुर्घटनाओं में गिना जाता है। NATO ने बुरेवेस्टनिक के लिए ‘Skyfall’ नाम का इस्तेमाल किया है। अमेरिका के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी थॉमस कंट्रीमैन ने भी इस हथियार परियोजना की कड़ी आलोचना की थी।
MIT के शोधकर्ताओं के विश्लेषण के मुताबिक, बुरेवेस्टनिक में डायरेक्ट-साइकिल एयर-ब्रीदिंग न्यूक्लियर प्रोपल्शन सिस्टम होने की संभावना है। आसान भाषा में समझें तो मिसाइल सामान्य ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय हवा को अपने भीतर मौजूद परमाणु रिएक्टर से गुजारकर गर्म करने की तकनीक इस्तेमाल कर सकती है।
एक कंप्रेसर हवा को रिएक्टर के कोर तक पहुंचाता है। वहां परमाणु प्रतिक्रिया से हवा गर्म होती है और फिर इंजन के पिछले हिस्से से बाहर निकलकर थ्रस्ट पैदा करती है। इस व्यवस्था में पारंपरिक मिसाइल इंजन की तुलना में ईंधन की सीमित क्षमता वाली समस्या काफी हद तक अलग हो जाती है।
हालांकि, इस सिस्टम की वास्तविक डिजाइन और तकनीकी संरचना को लेकर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी सीमित है। MIT के शोधकर्ताओं ने भी इसके डिजाइन को उपलब्ध तस्वीरों और रूसी मीडिया में सामने आए वीडियो के विश्लेषण के आधार पर समझने की कोशिश की है।
शोधकर्ताओं के मॉडलिंग के अनुसार, बुरेवेस्टनिक रूस की सबसे बड़ी क्रूज मिसाइलों से भी बड़ी है, लेकिन इसका आकार असाधारण रूप से विशाल नहीं है। एयरोडायनामिक विश्लेषण से अनुमान लगाया गया कि हवा में लगातार उड़ान बनाए रखने के लिए इसकी गति लगभग Mach 0.75, यानी करीब 575 मील प्रति घंटे हो सकती है।
यह गति लगभग एक आधुनिक यात्री विमान की क्रूजिंग स्पीड के आसपास बैठती है।
परमाणु ऊर्जा आधारित प्रोपल्शन का सबसे बड़ा संभावित फायदा इसकी लंबी उड़ान क्षमता है। पारंपरिक क्रूज मिसाइलों में ईंधन खत्म होने की सीमा होती है, जबकि परमाणु रिएक्टर आधारित इंजन लंबे समय तक ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है।
इसी वजह से रूस बुरेवेस्टनिक को ऐसी मिसाइल के तौर पर पेश करता है जो बेहद लंबी दूरी तय कर सकती है और अप्रत्याशित दिशा से लक्ष्य तक पहुंच सकती है। यही क्षमता इसे रूस के रणनीतिक हथियार कार्यक्रम का अहम हिस्सा बनाती है।
हालांकि, इसकी वास्तविक क्षमता, विश्वसनीयता और परमाणु प्रोपल्शन सिस्टम की व्यवहारिकता को लेकर विशेषज्ञों के बीच अभी भी कई सवाल हैं। आर्कटिक में हालिया सैन्य गतिविधियां यदि वास्तव में नए परीक्षण की तैयारी का हिस्सा हैं, तो आने वाले दिनों में इस मिसाइल को लेकर अंतरराष्ट्रीय निगाहें रूस पर और भी ज्यादा टिक सकती हैं।
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