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मेंटेनेंस के नाम पर हर साल 20 करोड़ खर्च, फिर भी टूट रही बरगी की नहरें

June 29, 2026

  • कैग ने उठाए सवाल, फिर भी बच गए जिम्मेदार

जबलपुर। किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने और महाकौशल की सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बरगी बांध से निकली दायीं और बायीं तट नहरों के निर्माण पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। दावा था कि ये नहरें वर्षों तक लाखों हेक्टेयर भूमि की प्यास बुझाएंगी, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट दिखाई देती है। नहरों की कॉन्क्रीट परतें जगह-जगह टूटकर बिखर चुकी हैं, कई हिस्सों में नहरें कच्चे नालों जैसी नजर आने लगी हैं और करोड़ों रुपये के मेंटेनेंस के बावजूद हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर साल 15 से 20 करोड़ रुपये केवल मरम्मत और रखरखाव पर खर्च किए जा रहे हैं तो आखिर नहरें बदहाल क्यों हैं? और यदि निर्माण में गुणवत्ता से समझौता हुआ था तो आज तक किसी अधिकारी या ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?


  • कैग ने उठाए थे सवाल, फिर भी नहीं जागा विभाग
    सूत्रों के अनुसार नहर निर्माण को लेकर कैग (ष्ट्रत्र) की रिपोर्ट में भी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए थे तथा ठेकेदारों को कथित रूप से अतिरिक्त भुगतान किए जाने जैसी आपत्तियां भी सामने आई थीं। इसके बावजूद वर्षों बीत जाने के बाद भी न तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई और न ही निर्माण एजेंसियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई।यही वजह है कि आज नहरों की हालत खुद सरकारी दावों की पोल खोल रही है।

    बरगी से निकलते ही शुरू हो जाती है बदहाली
    जांच में सामने आया कि बरगी बांध से कुछ ही दूरी पर नहरों का कॉन्क्रीटीकरण उखडऩा शुरू हो जाता है। सगड़ा-झपनी, बम्हनोदा, रोसरा, चाघाट, पिपरियाकलां, बरेला और आगे तक कई स्थानों पर नहर की दोनों दीवारों की कॉन्क्रीट प्लेटें टूटकर पानी में गिर चुकी हैं।इसी तरह बायीं तट नहर में बिजौरा, जमुनिया, सोमती और डभोला क्षेत्र के आसपास भी नहर लगातार क्षतिग्रस्त हो रही है। कई स्थानों पर कॉन्क्रीट पूरी तरह खत्म हो चुकी है और नहर की मूल संरचना खतरे में दिखाई दे रही है।

    मेंटेनेंस पर करोड़ों खर्च… लेकिन काम कहां?
    जल संसाधन विभाग हर साल नहरों की मरम्मत, सफाई और रखरखाव के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर जारी करता है। जानकारी के अनुसार यह राशि 15 से 20 करोड़ रुपये तक पहुंचती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकांश मरम्मत कार्य केवल कागजों तक सीमित रहते हैं। जहां काम होता भी है, वहां कुछ ही महीनों बाद फिर वही स्थिति बन जाती है। कई स्थानों पर वर्षों से कोई प्रभावी मरम्मत नहीं हुई, जबकि रिकॉर्ड में मेंटेनेंस पर लगातार खर्च दिखाया जाता रहा।

    निर्माण में मानकों से समझौता?
    तकनीकी जानकारों का कहना है कि नहरों के दोनों किनारों पर बनने वाली कॉन्क्रीट परत का उद्देश्य पानी का रिसाव रोकना होता है। इसके लिए निर्धारित गुणवत्ता की सीमेंट, रेत और गिट्टी के अनुपात के साथ विशेष मोटाई की पॉलीथीन शीट बिछाई जाती है, ताकि नीचे की नमी कॉन्क्रीट को नुकसान न पहुंचाए।आरोप है कि निर्माण के दौरान इन्हीं मानकों से समझौता किया गया। कम लागत में काम पूरा करने के लिए निम्न गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग किया गया, जिससे कुछ वर्षों में ही कॉन्क्रीट टूटकर बिखरने लगी।

    कमीशनखोरी का खेल?
    विभागीय सूत्रों का दावा है कि नहर निर्माण और बाद में मेंटेनेंस कार्यों में कमीशनखोरी की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया से लेकर भुगतान तक कई स्तरों पर कमीशन का खेल चलता है, जिससे निर्माण और मरम्मत दोनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो सवाल यह भी उठता है कि हजारों करोड़ की सार्वजनिक परियोजना की निगरानी करने वाली एजेंसियां आखिर कर क्या रही थीं?

    पहले भी टूट चुकी है नहर, किसानों को हुआ नुकसान
    कुछ माह पहले बरगी बांध के समीप नहर का एक हिस्सा टूट जाने से बड़ी मात्रा में पानी खेतों में भर गया था। इस घटना के कारण कई गांवों तक सिंचाई का पानी नहीं पहुंच पाया और सैकड़ों एकड़ फसल प्रभावित हुई। घटना के बाद मरम्मत तो हुई, लेकिन पूरे नेटवर्क की तकनीकी जांच नहीं कराई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते क्षतिग्रस्त हिस्सों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्निर्माण नहीं किया गया तो भविष्य में बड़े हादसे हो सकते हैं।

    लाखों हेक्टेयर सिंचाई दांव पर
    बरगी परियोजना की बायीं तट मुख्य नहर लगभग 137 किलोमीटर लंबी है, जिससे करीब 1.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है। वहीं दायीं तट मुख्य नहर लगभग 197.4 किलोमीटर लंबी है, जो करीब 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी उपलब्ध कराती है।ऐसी महत्वपूर्ण परियोजना की बदहाल स्थिति केवल सरकारी धन की बर्बादी नहीं बल्कि लाखों किसानों की आजीविका पर भी सीधा खतरा है।

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