
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच (Two-judge bench of Supreme Court) ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून पर (On Anti Corruption Law) खंडित फैसला सुनाया (Delivered Split Verdict) । भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में यह प्रावधान 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था, जिसमें यह अनिवार्य है कि अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार से पूर्व मंजूरी लेनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार कोजस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथ की बेंच ने अलग-अलग फैसला सुनाया है। भ्रष्टाचार विरोधी कानून पर दोनों जज एक-दूसरे से असहमत दिखे हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि धारा 17ए असंवैधानिक है, वहीं जस्टिस केवी विश्वनाथन ने ऐसा करने से इनकार किया। इसके बजाय उन्होंने इसे इस तरह से पढ़ा कि मंज़ूरी का सवाल लोकपाल या लोकायुक्त द्वारा तय किया जाना चाहिए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे खत्म कर देना चाहिए। कोई पूर्व मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है।” उनके अनुसार यह प्रावधान विनीत नारायण और सुब्रमण्यम स्वामी मामलों में जिन व्यवस्थाओं को पहले ही खत्म किया जा चुका है, उन्हें दोबारा लागू करने की कोशिश है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पूर्व मंजूरी की शर्त कानून के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ है। यह जांच प्रक्रिया में बाधा पैदा करती है और ईमानदार एवं सत्यनिष्ठ अधिकारियों की रक्षा करने के बजाय उन भ्रष्ट लोगों को बचाने का काम करती है, जिन्हें वास्तव में किसी संरक्षण की आवश्यकता नहीं है।
जबकि जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि एक स्वतंत्र एजेंसी, जो कार्यपालिका से मुक्त हो, उसे मंजूरी का सवाल तय करना चाहिए। इसलिए उन्होंने निर्देश दिया कि मंजूरी लोकपाल/लोकायुक्त द्वारा तय की जानी चाहिए। धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, इस शर्त के साथ कि मंजूरी राज्य के लोकपाल या लोकायुक्त द्वारा तय की जानी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि इस प्रावधान को खत्म करने का मतलब “बच्चे को नहाने के पानी के साथ बाहर फेंक देना” होगा और जब तक ईमानदार और लोक सेवकों को बेवजह की जांच से नहीं बचाया जाता, तब तक “नीतिगत लकवा” आ जाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोक सेवक को दुर्भावनापूर्ण मामलों से बचाने की जरूरत और सार्वजनिक कार्यालयों में ईमानदारी बनाए रखने के महत्व के बीच एक अच्छा संतुलन बनाए रखना होगा।
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