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‘लाहौर 1947’ की कहानी: इमोशनल ड्रामा में दिखेगा बंटवारे का दर्द, सनी देओल निभाएंगे अलग किरदार

March 10, 2026

 

नई दिल्ली। बॉलीवुड एक्टर(Bollywood actor) सनी देओल (Sunny Deol)के लिए आने वाला समय बेहद खास माना जा रहा है। उनकी बहुप्रतिक्षित फिल्मों में से एक ‘लाहौर 1947’ (Lahore 1947)इन दिनों काफी चर्चा में है। इस फिल्म को बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान (Aamir Khan)प्रोड्यूस कर रहे हैं, जबकि इसके डायरेक्टर राजकुमार संतोषी कर रहे हैं। फिल्म का नाम सुनते ही दर्शकों को लगा था कि यह भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित एक एक्शन फिल्म होगी, लेकिन असल में इसकी कहानी बेहद भावुक और मानवीय संबंधों को दर्शाने वाली है। इस फिल्म में सनी देओल का किरदार उनके अब तक के एक्शन इमेज से बिल्कुल अलग बताया जा रहा है।

बंटवारे की पृष्ठभूमि पर इंसानियत की कहानी
फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर की है, जब लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर नए देशों में बसना पड़ा था। इस कहानी का केंद्र एक मुस्लिम परिवार है, जिसे भारत के लखनऊ से पाकिस्तान के लाहौर जाना पड़ता है। सनी देओल फिल्म में अलेक्जेंडर मिर्जा का किरदार निभा रहे हैं। अलेक्जेंडर अपनी पत्नी हामिदा, बेटे जावेद और बेटी तनवीर के साथ लखनऊ में खुशहाल जीवन जी रहे होते हैं। लेकिन 1947 में देश के विभाजन के बाद हालात बदल जाते हैं और उन्हें मजबूरन अपना घर छोड़कर पाकिस्तान के लाहौर में बसना पड़ता है। यह वही दौर था जब दोनों देशों में शरणार्थियों का बड़ा संकट पैदा हो गया था और लोग अपनी पहचान, घर और संबंधों से बिछड़ रहे थे।

लाहौर की हवेली और ‘माई’ का किरदार
लाहौर पहुंचने के बाद सिकंदर और उसका परिवार जिस हवेली में रहने लगता है, वह एक बुजुर्ग हिंदू महिला ‘माई’ की होती है। इस किरदार को मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी निभा रही हैं। माई का बेटा रतन विभाजन के दौरान भारत चला जाता है और माई अकेली रह जाती हैं। हालात ऐसे बनते हैं कि सिकंदर का परिवार उसी हवेली में रहने लगता है। शुरुआत में माई उन्हें अपना घर छीनने वाला समझती हैं और नाराज रहती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनके और सिकंदर के परिवार के बीच एक भावुक रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत और अपनत्व का संदेश देता है।

धर्म और इंसानियत के बीच टकराव
कहानी में एक और अहम किरदार याकूब पहलवान का है, जो खुद को धर्म का रक्षक बताता है। उसे एक हिंदू महिला का मुस्लिम परिवार के साथ रहना पसंद नहीं आता और वह माई को परेशान करने लगता है। इसी दौरान एक कवि नासिर काजमी की एंट्री होती है, जो लोगों को धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत का पाठ पढ़ाते हैं। फिल्म का यह हिस्सा दर्शकों को गहराई से पहुंचाने वाला बताया जा रहा है। कहानी में आगे बढ़ने वाली माई का निधन हो जाता है और उनके अंतिम संस्कार को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।

भावुक अंत और इंसानियत का संदेश
फिल्म का क्लाइमैक्स बेहद भावुक है। जब माई के अंतिम संस्कार की बात आती है तो कवि नासिर काजमी कहते हैं कि माई हिंदू थीं, इसलिए उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से होना चाहिए। हालांकि कट्टरपंथी सोच रखने वाला याकूब पहलवान इसका विरोध करता है और इस विवाद के दौरान नासिर काजमी की हत्या कर देता है। अंत में सिकंदर और लाहौर के कई मुस्लिम लोग मिलकर माई का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से करते हैं। इस दृश्य के जरिए फिल्म इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द का गहरा संदेश देती है।

  • नाटक से प्रेरित है फिल्म
    ‘लाहौर 1947’ की कहानी प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत के प्रसिद्ध नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ’ से प्रेरित है। इस शीर्षक का अर्थ है कि जिसने लाहौर नहीं देखा उसने जीवन को पूरी तरह नहीं जिया। फिल्म में प्रीति जिंटा सिकंदर की पत्नी हमीदा के किरदार में नजर आएंगी। फिल्म का संगीत प्रसिद्ध संगीतकार ए. आर. रहमान ने तैयार किया है, जबकि गानों के बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं।

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