
नई दिल्ली। टाटा साम्राज्य की परोपकारी संस्था टाटा ट्रस्ट ने रविवार को एक दूरगामी फैसला लिया है। ट्रस्ट ने बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन (बाई हीराबाई ट्रस्ट) के ट्रस्टी बनने की पात्रता शर्तों में मौजूद भेदभावपूर्ण नियमों को बदलने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का एलान किया है। इसमें सबसे प्रमुख मुद्दा गैर-पारसी व्यक्तियों के ट्रस्टी बनने पर लगी पाबंदी को हटाना है।
कुछ दिनों पहले टाटा ट्रस्ट के पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास एक शिकायत दर्ज कराई थी। मिस्त्री ने दिग्गज उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह की बाई हीराबाई ट्रस्ट के बोर्ड में नियुक्ति को अवैध बताया था। उनका तर्क था कि ट्रस्ट की मूल अनुबंध के अनुसार, ट्रस्टी का पारसी जोरास्ट्रियन होना और मुंबई का निवासी होना अनिवार्य है, जबकि ये दोनों इन शर्तों को पूरा नहीं करते।
विवाद बढ़ता देख 17 अप्रैल 2026 को टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा की अध्यक्षता में बोर्ड की बैठक हुई। बैठक में ट्रस्टियों ने कहा कि टाटा समूह की नींव समावेशी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर टिकी है। ट्रस्ट ने बयान जारी कर कहा, ‘ट्रस्ट डीड की विसंगतियों को दूर करने और इसे टाटा ट्रस्ट्स के आदर्शों के अनुरूप बनाने के लिए, ट्रस्टियों ने उचित प्राधिकारी के समक्ष प्रतिबंधात्मक धाराओं में बदलाव की कार्यवाही अपनाने का निर्णय लिया है।’
टाटा ट्रस्ट का कहना है कि बाई हीराबाई ट्रस्ट का निर्माण 1916 में सर रतन टाटा की वसीयत के तहत हुआ था, जिसमें धर्म या जाति के आधार पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी। हालांकि, 1923 में तत्कालीन ट्रस्टियों की ओर से बनाई गई डीड में ये प्रतिबंध जोड़ दिए गए थे। ट्रस्ट का तर्क है कि वे केवल मूल संस्थापक की इच्छा को बहाल कर रहे हैं।
इस विवाद के बीच वेणु श्रीनिवासन पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। चर्चा है कि उन्होंने ट्रस्ट के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा के कहने पर पद छोड़ा, जिससे विवाद को विराम दिया जा सके। हालांकि, बोर्ड ने सीईओ सिद्धार्थ शर्मा के काम पर पूरा भरोसा जताया है। दूसरी ओर, मेहली मिस्त्री के करीबियों का कहना है कि ट्रस्ट की ओर से नियमों में बदलाव की कोशिश ही इस बात का सबूत है कि अब तक जो नियुक्तियां हुईं, वे नियमों के खिलाफ थीं। अब गेंद चैरिटी कमिश्नर के पाले में है।
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