
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व नेता राघव चड्ढा (Raghav Chadha) ने हाल ही में राज्यसभा (Rajya Sabha) के छह अन्य सदस्यों के साथ पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने की घोषणा की है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आया है। चार साल पहले राज्यसभा के सबसे युवा सांसद के रूप में राघव चड्ढा द्वारा पेश किया गया पहला निजी विधेयक अगर आज कानून बन चुका होता, तो न तो वह और न ही उनके साथी इस तरह पार्टी बदल पाते।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में राघव चड्ढा ने घोषणा की कि वह AAP के छह अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ मिलकर BJP में विलय कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए संसद में मौजूद दो-तिहाई (2/3) बहुमत वाले नियम का हवाला दिया। मौजूदा स्थिति में AAP के राज्यसभा में 10 सांसद हैं और सात सांसदों (चड्ढा सहित) का एक साथ जाना दल-बदल विरोधी कानून के तहत आवश्यक 2/3 आंकड़े को पूरा करता है, जिससे उनकी सदस्यता पर कोई खतरा नहीं रहता।
अपने ही बिल में उलझ जाते चड्ढा
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह एक बड़ी विडंबना है कि 5 अगस्त 2022 को राज्यसभा में प्रवेश के कुछ ही महीनों बाद राघव चड्ढा ने एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था। उस समय वह अरविंद केजरीवाल के करीबी सहयोगियों में शामिल थे और उन्होंने दल-बदल विरोधी कानून को और सख्त बनाने की मांग की थी।
अगर उनका वह प्रस्तावित बिल कानून बन जाता, तो मौजूदा स्थिति में उनके लिए पार्टी बदलना आसान नहीं होता:
– उन्हें विलय के लिए सात अन्य सांसदों का समर्थन लेना पड़ता, न कि छह का
– पार्टी बदलने पर संबंधित सांसदों पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती थी
चड्ढा के 2022 के बिल के मुख्य प्रस्ताव
इस संविधान संशोधन विधेयक में दल-बदल रोकने के लिए कई सख्त प्रावधान सुझाए गए थे। इसका उद्देश्य उन गतिविधियों को रोकना था, जिन्हें “जनप्रतिनिधियों द्वारा लोकतांत्रिक जनादेश की अनदेखी” कहा गया।
प्रमुख सुझाव:
– विलय की सीमा 2/3 से बढ़ाकर 3/4 करने का प्रस्ताव
– दल बदलने पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध
– हॉर्स ट्रेडिंग और विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए सख्त समय सीमा और उपस्थिति नियम
संविधान में बदलाव का प्रस्ताव
इस बिल के तहत संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के साथ-साथ दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की गई थी। इसका उद्देश्य सांसदों और विधायकों को राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बजाय जिम्मेदार कानून निर्माता बनाना बताया गया था।
मौजूदा स्थिति
राघव चड्ढा ने उस समय तर्क दिया था कि दल-बदल कानून के बावजूद हॉर्स ट्रेडिंग और राजनीतिक खरीद-फरोख्त की समस्या बनी हुई है, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस नियम को वह और सख्त बनाना चाहते थे, आज उसी दो-तिहाई प्रावधान का उपयोग करके उनके और उनके साथियों के लिए पार्टी बदलना संभव हो रहा है। राज्यसभा रिकॉर्ड के अनुसार, उनका यह बिल अभी भी लंबित है।
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