
नई दिल्ली । 14 मई 1948 को तेल अवीव में यहूदी एजेंसी के अध्यक्ष डेविड बेन-गुरियन (David Ben-Gurion) ने अलग इजरायल देश (Israel) की घोषणा की. इस तरह 2,000 वर्षों में पहला यहूदी (Jews) राज्य स्थापित हुआ और बेन-गुरियन इजरायल के पहले प्रधानमंत्री बने. उस दिन ब्रिटिश सेना की वापसी के तुरंत बाद यहूदियों और अरबों के बीच छिड़े युद्ध की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी. उसी शाम मिस्र ने इजरायल पर हवाई हमला किया. तेल अवीव में बिजली गुल होने और अरब आक्रमण की आशंका के बावजूद, यहूदियों ने अपने नए राष्ट्र के जन्म का जश्न मनाया.
इजरायल में लोगों को जब यह खबर मिली कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने यहूदी राज्य को मान्यता दे दी है. आधी रात को ही फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासन की समाप्ति के साथ इजरायल राज्य आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आ गया और लोग खुशियां मनाने लगे.
आधुनिक इजरायल की उत्पत्ति जायोनिज्म आंदोलन से हुई है, जिसकी स्थापना 19वीं शताब्दी के बाद रूसी साम्राज्य के यहूदियों ने की थी. उत्पीड़न सहने के बाद उन्होंने एक क्षेत्रीय यहूदी राज्य बनाने का आह्वान किया.
1896 में, यहूदी-ऑस्ट्रियाई पत्रकार थियोडोर हर्ज़ल ने ‘ द ज्यूइश स्टेट’ नामक एक प्रभावशाली राजनीतिक पुस्तिका प्रकाशित की. जिसमें तर्क दिया गया कि यहूदी राज्य की स्थापना ही यहूदियों को यहूदी-विरोधी भावना से बचाने का एकमात्र तरीका है. हर्जल जायोनिज्म के नेता बन गए और उन्होंने 1897 में स्विट्जरलैंड में पहले जायोनिस्ट कांग्रेस का आयोजन किया.
यहूदियों के मूल निवास स्थान, ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण वाले फिलिस्तीन को यहूदी राज्य के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया और हर्जल ने ओटोमन सरकार से एक चार्टर के लिए याचिका दायर की, लेकिन वे असफल रहे.
1905 की असफल रूसी क्रांति के बाद , पूर्वी यूरोप और रूस से बड़ी संख्या में यहूदी फिलिस्तीन में आकर बसने लगे और पहले से बसे कुछ हजार यहूदियों में शामिल हो गए. यहां बसने वाले यहूदी ने हिब्रू को अपनी बोलचाल की भाषा के रूप में अपनाने पर जोर दिया. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ओटोमन साम्राज्य के पतन के साथ , ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर कब्जा कर लिया.
1917 में, ब्रिटेन ने बाल्फोर घोषणा जारी की, जिसमें फिलिस्तीन में एक यहूदी मातृभूमि स्थापित करने के अपने इरादे की घोषणा की गई. अरब राज्यों द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद, बाल्फोर घोषणा को फिलिस्तीन पर ब्रिटिश शासनादेश में शामिल किया गया, जिसे 1922 में राष्ट्र संघ द्वारा अधिकृत किया गया था.
फिलिस्तीन में किसी भी यहूदी राज्य की स्थापना के प्रति अरब विरोध के कारण, 1920 और 30 के दशक में ब्रिटिश शासन जारी रहा. 1929 से शुरू होकर, फिलिस्तीन में अरब और यहूदी खुलेआम आपस में भिड़ते रहे और ब्रिटेन ने अरबों को शांत करने के लिए यहूदी आप्रवासन को सीमित करने का प्रयास किया.
यूरोप में हुए होलोकॉस्ट के परिणामस्वरूप, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई यहूदी अवैध रूप से फिलिस्तीन में प्रवेश कर गए. यहूदी समूहों ने फिलिस्तीन में ब्रिटिश सेनाओं के खिलाफ आतंकवाद का सहारा लिया, क्योंकि उनका मानना था कि ब्रिटिश सेनाओं ने जायोनी आंदोलन के साथ विश्वासघात किया है.
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, 1945 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जायोनी आंदोलन का समर्थन किया. व्यावहारिक समाधान न मिलने पर ब्रिटेन ने इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष रखा, जिसने नवंबर 1947 में फिलिस्तीन के विभाजन के पक्ष में मतदान किया.
फिलिस्तीन की आधी से ज़्यादा जमीन यहूदियों को मिलनी थी, जबकि फिलिस्तीन की कुल आबादी यहूदियों की आधी से भी कम थी. फिलिस्तीनी अरबों ने, दूसरे देशों के वॉलेंटियर की मदद से, जायोनी सेनाओं से लड़ाई लड़ी, लेकिन 14 मई 1948 तक यहूदियों ने फिलिस्तीन में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आवंटित अपने हिस्से और कुछ अरब क्षेत्रों पर भी पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया था.
ब्रिटिश सेना के जाने के बाद बना अलग देश
14 मई को, ब्रिटेन ने अपने कार्यकाल की समाप्ति के साथ ही फिलिस्तीन से अपना अधिकार वापस ले लिया और इजरायल राज्य की घोषणा की गई. अगले दिन, मिस्र, ट्रांसजॉर्डन, सीरिया , लेबनान और इराक की सेनाओं ने आक्रमण कर दिया. हालांकि, इजरायली सेना के पास पर्याप्त हथियार नहीं थे, फिर भी वे अरबों को खदेड़ने में कामयाब रहे और फिर गैलील, फिलिस्तीनी तट और तटीय क्षेत्र को यरुशलम के पश्चिमी भाग से जोड़ने वाले भूभाग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया.
1949 में, संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के बाद, इजरायल को इस जीते हुए क्षेत्र पर स्थायी नियंत्रण प्राप्त हो गया. युद्ध के दौरान इजरायल से लाखों फिलिस्तीनी अरबों के चले जाने से देश में यहूदियों की संख्या काफी अधिक हो गई.
इजरायल पर लगातार अरब देशों ने किया था हमला
तीसरे अरब-इजरायल संघर्ष—1967 के छह दिवसीय युद्ध—के दौरान, इजरायल ने एक बार फिर अपनी सीमाओं का काफी विस्तार किया और जॉर्डन, मिस्र और सीरिया से यरुशलम का पुराना शहर, सिनाई प्रायद्वीप, गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक और गोलान हाइट्स पर कब्जा कर लिया.
1979 में, इजरायल और मिस्र ने एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए , जिसके तहत इजरायल ने मिस्र की मान्यता और शांति के बदले सिनाई प्रायद्वीप वापस कर दिया. इजरायल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) ने 1993 में एक महत्वपूर्ण शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में धीरे-धीरे फिलिस्तीनी स्वशासन को लागू करने की परिकल्पना की गई थी.
हालांकि, इजरायल-फिलिस्तीनी शांति प्रक्रिया धीमी गति से आगे बढ़ी और 21वीं सदी के दौरान, इजरायल और कब्जे वाले क्षेत्रों में इजरायलियों और फिलिस्तीनियों के बीच भीषण लड़ाई फिर से शुरू हो गई.
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