
नई दिल्ली: केरल हाईकोर्ट से प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक बड़ी कानूनी और रणनीतिक सफलता मिली है, जिसे राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की बेटी से जुड़े कथित वित्तीय लेनदेन मामले में एक तगड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है. हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत ईडी की व्यापक जांच शक्तियों को पूरी तरह से हरी झंडी दे दी है. अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जांच एजेंसी को मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में अपनी कार्रवाई शुरू करने या कुर्की जैसी सिविल प्रक्रिया अपनाने के लिए किसी अनुसूचित अपराध में पहले से आधिकारिक एफआईआर (FIR) या शिकायत दर्ज होने का इंतजार करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है. इस फैसले के बाद से राज्य की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है.
अदालत ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में मनी लॉन्डिंग मामले की सूचना रिपोर्ट यानी ECIR की कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है. माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ECIR को पुलिस द्वारा दर्ज की जाने वाली एफआईआर के समकक्ष नहीं माना जा सकता है. यह महज केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी की एक आंतरिक और गोपनीय प्रक्रिया का हिस्सा है जिसका मुख्य उद्देश्य किसी भी संभावित वित्तीय हेराफेरी या धन शोधन की जांच शुरू करने का एक प्रशासनिक रिकॉर्ड बनाए रखना है. इसलिए प्रारंभिक स्तर पर ही इसके अधिकार क्षेत्र को चुनौती देना पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं है.
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से मैसर्स कोचीन मिनरल्स एंड रुटाइल लिमिटेड (CMRL) नाम की एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी से जुड़ा हुआ है जो एरनाकुलम के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में रजिस्टर्ड है. साल 2019 में आयकर विभाग ने इस कंपनी के परिसरों, इसके प्रबंध निदेशक और कुछ बेहद खास कर्मचारियों के ठिकानों पर धारा 132 के तहत एक बड़ा सर्च ऑपरेशन चलाया था. इसके बाद कंपनी को असेसमेंट ईयर 2013-14 से लेकर 2019-20 तक के लिए नोटिस जारी किए गए थे. हालांकि, बाद में कंपनी ने सेटलमेंट कमीशन का रुख किया, जहां से उन्हें अभियोजन से कुछ अंतरिम राहत या इम्युनिटी मिलने की बात सामने आई थी.
इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब 25 सितंबर 2023 को शोन जॉर्ज नामक व्यक्ति ने कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के समक्ष एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई. इस शिकायत में कंपनी के मामलों और मुख्यमंत्री की बेटी की फर्म के साथ हुए कथित वित्तीय लेनदेन की गहन जांच करने की मांग उठाई गई थी. इसके बाद जब ईडी ने इस मामले में अपनी सक्रियता बढ़ाई और समन जारी किए, तो अपीलीय पक्षों द्वारा इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यही था कि जब तक किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा मूल अपराध (Predicate Offence) में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जाती, तब तक ईडी को PMLA की धारा 50 के तहत समन जारी करने या दस्तावेज मांगने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है.
इससे पहले 26 मई 2026 को अदालत की सिंगल बेंच ने भी अपीलीयकर्ताओं द्वारा उठाई गई इन तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज करते हुए ईडी की कार्रवाई को नियमानुसार सही ठहराया था. सिंगल बेंच के इसी फैसले को चुनौती देते हुए रिट अपील (W.A. No. 1140 of 2026) दायर की गई थी. अब हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ का हवाला देते हुए साफ कर दिया है कि PMLA के तहत ईडी की शक्तियां बेहद व्यापक हैं. एजेंसी प्रारंभिक स्तर पर एफआईआर के अभाव में भी स्वतंत्र रूप से मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की जांच कर सकती है और किसी भी व्यक्ति को दस्तावेज पेश करने या बयान दर्ज कराने के लिए बाध्य कर सकती है.
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