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समाज की उल्टी परंपरा, जहां दूल्हा जाता है ससुराल और निभाता है अनोखी रस्म

June 08, 2026

नई दिल्ली। सहारा रेगिस्तान (Sahara Desert dwells)की तपती रेत और कठिन जीवन परिस्थितियों(living conditions) के बीच एक ऐसी जनजाति भी रहती है, जिसकी परंपराएं दुनिया की आम सामाजिक संरचना से बिल्कुल अलग हैं। यह है तुआरेग जनजाति, जिसे “ब्लू मेन ऑफ द सहारा”(Blue Men of the Sahara) भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान है पुरुषों का घूंघट पहनना और शादी के बाद पति का पत्नी के घर जाकर रहना।

तुआरेग समाज में पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला नीला घूंघट, जिसे स्थानीय भाषा में ‘टैगेलमस्ट’ कहा जाता है, केवल परंपरा नहीं बल्कि उनकी जीवनशैली का अहम हिस्सा है। लगभग 25 वर्ष की उम्र के बाद पुरुष इस घूंघट को पहनना शुरू करते हैं। यह कपड़ा उन्हें रेगिस्तान की तेज धूप, धूल और रेत से बचाता है। समय के साथ यह नीला रंग उनके चेहरे पर भी उतर आता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है।

इस समाज की सबसे चौंकाने वाली विशेषता इसकी पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था है। यहां शादी के बाद पुरुष अपने घर में नहीं रहता, बल्कि पत्नी के घर जाकर शिफ्ट हो जाता है। यह व्यवस्था पूरी तरह मातृसत्तात्मक (matrilineal) है, जिसमें वंश और संपत्ति मां की लाइन से आगे बढ़ती है। बच्चों की पहचान भी मां के परिवार से जुड़ी होती है।

तुआरेग समाज में घर या तंबू महिलाओं की संपत्ति माना जाता है। शादी के समय भी महिला अपना तंबू लेकर आती है और परिवार की अधिकांश संपत्ति, जैसे पशुधन और घरेलू सामान, महिलाओं के नियंत्रण में रहते हैं। यदि तलाक होता है, तो पुरुष को घर छोड़ना पड़ता है, जबकि बच्चे अपनी मां के साथ ही रहते हैं।

इस जनजाति में महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी स्वतंत्रता प्राप्त है। वे व्यापार करती हैं, बाजार संभालती हैं और सामाजिक फैसलों में भी अहम भूमिका निभाती हैं। पारंपरिक संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रहती है। यहां महिलाएं अपनी इच्छा से विवाह कर सकती हैं और जरूरत पड़ने पर तलाक का निर्णय भी ले सकती हैं।

हालांकि समाज में नेतृत्व पूरी तरह महिलाओं के हाथ में नहीं है। जनजाति के प्रमुख और सरदार आमतौर पर पुरुष ही होते हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि नेतृत्व की वंश परंपरा भी मां के परिवार से जुड़ी होती है।


  • तुआरेग जनजाति की परंपराएं आज भी माली, नाइजर, अल्जीरिया, लीबिया और बुर्किना फासो जैसे देशों के रेगिस्तानी क्षेत्रों में जीवित हैं। हालांकि आधुनिक शिक्षा और शहरी जीवन के प्रभाव से कुछ युवा इन परंपराओं से दूर हो रहे हैं, फिर भी गांवों में यह संस्कृति मजबूत बनी हुई है।

    सोशल मीडिया पर जब भी इस जनजाति की तस्वीरें सामने आती हैं, लोग हैरान रह जाते हैं। कोई इसे महिला सशक्तिकरण का उदाहरण मानता है, तो कोई इसे एक अलग सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखता है। लेकिन सच्चाई यह है कि तुआरेग समाज अपनी जरूरतों और जीवन परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुई एक अनोखी सांस्कृतिक व्यवस्था है।

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